Thursday, 29 January 2015

लघुकथा :- राहुकाल
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कहा गया है कि राहुकाल दिन में एक बार आता है वह भी डेढ़ घंटे के लिये , सूर्यास्त से पहले । सेठ रामानंद की बीच बाजार में ज्वेलरी की दुकान है , करीब पचहत्तर साल पुरानी उनकी गद्दी है और उनका ग्रहों की चाल पर बड़ा यकीन है हर कार्य की शुरआत शुभ मुहुर्त के साथ शुरू होती है। अभी पिछले हफ्ते की बात है अपने पीढ़ी पुराने पंडित जी के कहने पर शेयर बाजार में लाखों रूपये का सट्टा खेल गये उस दिन ग्रहों की चाल सही थी और रातों रात उनकी किस्मत के सितारे बुलंदी को छू गये । कहते हैं कि बिना मेहनत के कमाया पैसा हराम का होता है और वह ज्यादा देर तक टिकता नहीं जैसे आता है वैसे ही चला जाता है । ठीक वही सेठ जी के साथ भी हुआ आज बाज़ार उलटी चाल चल दिया , बड़ी उलट फेर के साथ , वायदा कारोबार , बंद हुआ। जितना कमाया नहीं उससे ज्यादा का गवां बैठे । सेठ जी का पूरा शरीर पसीने-पसीने था , पंडित के कहने पर आज फिर सट्टा खेल गये । पंडित से बाज़ार की उलट चाल को जानने के लिये फ़ोन मिला-मिला कर थक चुके थे "अरे यह क्या इसका तो फोन ही स्विच ऑफ आ रहा है " सेठ जी मन ही मन बुदबुदाये । आखिर में झक मार कर सेठ जी ने अपनी गद्दी के पास पड़े अखबार के पन्ने पलटने लगे तभी उनकी नज़र आज के पंचांग पर पड़ी -"यह क्या फिर वह मन ही मन बुदबुदाये प्रातः साढ़े नौ से ग्यारह बजे तक राहुकाल लगा है यथा संभव संभल के रहे"। तो क्या पंडित ने पैसा राहुकाल के समय लगवा दिया । "अरे पंडित ये क्या कियो मारो साथ तू तो मारे पीसो को डुबवा दियो " आण दे थारी सारी पंडिताई निकलवा ना दी तो देख। हाय मेरो पीसो हाय राहुकाल
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
29/01/2015


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