Saturday, 31 January 2015

लघुकथा:- आकाश वाणी
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हे दुष्ट पापी इंद्र , तू दिन भर सुरा के नशे में चूर अपनी सभा में सुंदर अप्सराओं से घिरा रहता है । दिन तू अपना सारा नाच गाने में बर्बाद करता है । तुझे इंद्र की पदवी क्या इसलिये दी गयी है , तू अपनी कर्तव्य निष्ठा से क्यों भटक गया । तेरा कार्य धरती लोक पर वर्षा कर वहाँ के लोंगो को खुशहाल रखना है।पर तुझे अपने रंगमंचो से फुर्सत मिले तब तो तुझे यह सब बातें पता हों । तू पापी है इंद्र तेरी इस लापरवाही की वजह से पृथ्वी लोक में ना जाने कितने किसान हर वर्ष आत्महत्या करते हैं खास तौर पर भारतवर्ष में विधर्भ ,म०प्र०,छत्तीस गढ़ , उ०प्र० का बाँदा। रात में अपनी पत्नी शची के साथ नरम मुलायम गद्दे पर सोया इंद्र हड़बड़ा कर उठ गया । अरे यह क्या अभी तो कितनी रात बाकी है जरूर मैंने दुःस्वप्न देखा होगा । भला इस आधुनिक मोबाइल युग में कोई मुझ इंद्र को भी चेतावनी दे सकता है । तभी शची ने इंद्र के पीठ पर जोरदार घूँसा जमाते हुए कहा "अरे ओ नौटंकी दिन भर रंभा , उर्वषी को नहीं छोडते और रात में उनके सपने देख कर मेरी नींद मत हराम करो ,चलो सो जाओ "
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०

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