Monday, 19 January 2015




लघुकथा :- मुक्ति
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गुटखे (पान मसाला) का सेवन इतना हानिकारक हो सकता है , यह बात तो अरविन्द ने कभी सपने में भी नहीं सोची थी । अभी उसकी उम्र ही कितनी थी मात्र तीस साल की । उसके पिता जी को फालिज पड़ने के कारण अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे थे । पत्नी ,तीन छोटे बच्चे और गाँव में उसके बीमार बाप और बूढी माँ इन सबकी जिम्मेदारी का  बोझ अब उसके कन्धों पर था। अक्सर वह डिपो में मीटिंग के दौरान दर्द से दोहरा हो जाता था । एक बार जब हम लोंगो ने उससे दर्द का कारण पूछा तो उसने अपने गाल के अंदर के हिस्से पर सफ़ेद झिल्ली दिखाई और कहने लगा कि इसमें पता नही क्यों दर्द होता है । सभी लोंग उसको गुटखा व शराब छोड़ने की बात कहते तो वह हँस कर टाल देता कि मामूली सा जख्म है ठीक हो जायेगा । आज करीब चार साल बाद मेरी अचानक उससे बाजार मे मुलाक़ात हुई , मैं तो उसे पहचान ही नहीं पाया उसके गाल पर लंबा सा चीरा और टाँके के निशान जो थे । उस पर वह अपना मुँह भी ठीक ढंग से बोलने के लिये खोल भी नहीं पा रहा था , पता नहीं कैसे बेचारा खाता पीता होगा । शरीर सूख कर काँटा हो गया था उसका । दौड़ कर वह मेरे गले लग गया और फफक कर रोने लगा मैंने भी उसे गले लगा कर उसका हाल-चाल पूछा तो वह गाल की ओर इशारा करके  बोला कि उसको कैंसर हो गया है । यह सब सुन कर , मेरे तो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी कि कैंसर तो एक लाइलाज बीमारी है । बताने लगा काफी खर्चा हो गया है गाँव में जो जमीन थी वह भी बिक गई इलाज में । वह बोले जा रहा था और मैं चुपचाप उसकी बातें शांत मन से सुनता जा रहा था । चलते वक्त उसने मुझसे हाथ मिलाया और कहने लगा पता नहीं मैं कब तक इसे खीँच पाउँगा । मैंने उसको दिलासा देते हुए कहा ऐसा कुछ भी नहीं होगा मैं भी जानता था कि उसको झूठी दिलासा दे रहा हूँ । इधर काफी दिनों से मैनें उसको फ़ोन मिलाने की कोशिश की पर सब व्यर्थ हर बार उसका फ़ोन स्विचड ऑफ बता रहा था । मैं भी आई गई बात सोच कर भूल गया और अपने काम पर लग गया । एक दिन मुझे अरविन्द के गुज़र जाने की खबर मिली ।इस घटना ने मुझे झकझोर के रख दिया और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अरविन्द को तो कैंसर से मुक्ति मिल गयी पर इस मुक्ति ने , जिसका जवान कमाऊं पूत गुजर गया हो , उसके बेसहारा बूढ़े माँ-बाप , पत्नी व बच्चों का क्या हाल होगा , ना जाने किस हाल में होंगे , क्या बीत रही होगी उन पर ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ। उ०प्र०

१९/०१/२०१५

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