Sunday, 25 January 2015

लघुकथा:-  मनचले

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रोजी,अपने चार भाई बहनों में सबसे बड़ी है। बचपन में ही उसके पिता ने उसकी माँ को छोड़ कर दूसरी शादी कर ली थी । बचपन का संघर्षमय जीवन ,भाई बहनों की पढ़ाई और माँ की बीमारी ने उसके आगे पढ़ने लिखने के सभी रास्ते बंद कर उसे छोटे-मोटे काम कर पैसा कमाने के लिये मजबूर कर दिया था । कभी वह बार डांसर का काम करती तो कभी किसी रईस की महफ़िल में गाने गाती । धीरे-धीरे रोजी की मेहनत रंग लाने लगी और एक दिन उसे एक विज्ञापन की एजेंसी में नौकरी मिल गई । रोजी के पहले टीवी एड ने रातों रात उसको स्टार बना दिया था । जिस मोहल्ले के लोग उससे व उसके परिवार से अनभिज्ञ थे । आज वही उसकी चर्चा कर रहे थे । मशहूर रोजी को अब रोज देर रात घर लौटते वक्त मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े बीड़ी सुलगाते मनचलों का सामना करना पड़ता है । इस बार तो हद ही पार हो गयी जब उसे एक दिन अपनी बीमार माँ की दवाई लेने के लिये सुबह-सुबह मेडिकल स्टोर जाना पड़ा । मेडिकल स्टोर की ओर को  बड़ते उसके  कदम भरी भीड़ में अचानक ठिठक के रूक जातें हैं जब उसको अहसास होता है कि उसके हाथ को किसी ने पकड़ रखा है। इससे पहले कि वह पीछे मुड़ कर देखती तभी उसके कानों पर आवाज़ पड़ती है जानेमन रोज औरों की रातें गुलजार करती हो कभीकभी हमारे भी हालचाल ले लिया करो । रोजी  तेजी से पीछे घूमी और खींच कर एक जोरदार तमाचा रसीद दिया उस मनचले के गाल पर । क्रोध से कांपती रोजी की आँखों से झरते आंसूओं की अविरल धारा मानो उससे पूछ रही हो-कि "क्या लड़की होना अभिशाप है ?"

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
25/01/2015

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