Sunday, 11 January 2015

लघुकथा:-दिव्यमणि 
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उसका नाम हरिया था , वह अपनी बूढ़ी माँ के साथ पहाड़ी के ऊपर एक टूटी -फूटी झोपडी में रहता था । जब वह छोटा था तब उसके पिता का स्वर्गवास हो गया था , पिता की विरासत में उसको कुछ बकरियां, एक टूटा संदूक और उसके अंदर रखी एक बांसुरी मिली थी। अल सुबह हरिया की माँ एक पोटली में रूखा सूखा खाना रख कर बकरियाँ चराने उसे घाटी की ओर भेज देती। दिन भर उसकी बकरियाँ इधर उधर पेड़ की पत्तियां , घाँस फूँसे चरती और वह एक पेड़ के नीचे बैठ के अपनी कमर से मुरली निकाल कर उसमें अपने प्राण फूंक कर सुंदर धुनें निकालता था। उसकी मुरली की तानें इतनी मधुर होती थी , कि सुदूर उत्तर के परी लोक मे दिव्या नाम की परी के कानों मे पड़ती और वह उसकी सुरीली धुनों पर मन्त्र मुग्ध हो जाती थी। जब भी हरिया अपनी मुरली बजाता तो वह अपनी सुधबुध खो बैठती थी । एक दिन परी दिव्या का हरिया की मुरली के प्रति आकर्षण उसको उसके परी लोक से धरती पर खींच लाया । उसने धरती पर उतर कर सबसे पहले अपना रूप एक गाँव की लड़की कीतरह धारण किया जो सिर पर घास का गठ्ठर रखी हुई थी और हरिया जहाँ अपनी आँखे बंद करके बांसुरी बजा रहा था , वहां से गुजरने का नाटक किया और झठ से घास के गट्ठर को जमीन पर रख वहीँ जमीन पर बैठ जाती है और मंत्रमुग्ध होकर उसकी मुरली के मधुर ध्वनि मे धरती पर ही स्वर्ग के होने का अहसास अनुभव करती है , अचानक हुई आहट सुन कर हरिया की आँखें खुल जाती है , और वह अपने सामने आँखे बंद किये हुए उसकी मुरली की धुन पर मस्त हिलोरे ले रही एक लडकी को बैठे हुए देखता है । वह मुरली बजाना बंद कर परी से पूछता है कि तुम कौन हो , कहाँ से आई हो, यहाँ क्या कर रही हो ? परी ने उत्तर दिया " कुछ नहीं , मैं उस सामने वाली पहाड़ी पर रहतीं हूँ और मैं घास काटने के लिए नीचे उतरी थी ,घर वापस जाते हुये थक गयी थी इसलिये थोडा सुस्ताने बैठ गयी । हरिया आगे कहता उस पहाड़ी पर तो मेरी भी झोपड़ी है पर तुम्हे तो इससे पहले तो कभी देखा नहीं । परी ने उसकी बात को काटते हुए कहा कि "मैं तो रोज यहीं से आती जाती हूँ पर तेरी ही नजर कभी नहीं पड़ी होगी मुझ पर तो उसमे मेरा क्या कसूर" भोला हरिया उसकी बात को सच मान लेता है । "चलो शाम होने को आई अब घर चलते हैं " परी ने कहा। दोनों वहां से उठ कर घर की ओर निकले हैं ।परी उसको घर तक छोड़ कर आगे बढ़ जाती है यह कहते हुए कि उसका घर आगे ही पड़ता है और वह कह कर चल देती है। परी ,हरिया की धुन को रोज तन्मयता से सुनती और संगीत का आनन्द लेती । जब कुछ दिनों तक हरिया की मुरली की ताने परी लोक तक नहीं पहुंचती है तो परी को चिंता होती है और वह हरिया से मिलने पुनः धरती लोक मे उतरती है । और उस जगह पहुंचती है जहाँ वह उससे पहली बार मिली थी । यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है और वह रोज इस आस से धरती पर आती कि शायद आज हरिया से उसकी मुलाक़ात ज़रूर होगी । पर हर बार उसे खाली हाथ वापस जाना पड़ता। एक दिन चुपचाप वह सीधे हरिया के घर जा पहुंचती है और देखती है कि हरिया अपनी बूढ़ी माँ के पास सिरहाने पर बैठा रो रहा है वह इस बात का कारण जानने के लिये वह फिर से उसी गाँव की लड़की का रूप धर कर उसको उसके घर के बाहर आवाज लगाती है -हरिया ओ हरिया -हरिया घर के बाहर निकल कर आते हुये सीधे उससे पूछता है "क्या बात है ? क्या काम है ? परी उससे पूछती है आजकल तू अपनी बकरियाँ चराने नीचे क्यों नहीं आता ? क्या बताऊँ हरिया रोते हुये परी से कहता है कि उसकी माँ बहुत बीमार है और घर मे खाने को एक दाना भी नहीं है , शहर का डॉक्टर कहता है इलाज बहुत महंगा है , हरिया की बात सुन कर परी की आँखों मे आंसू आ जाते हैँ और वहां से अंतर्धान हो जाती है। हरिया आश्चर्य मे पड़ जाता है उसने जो कुछ भी अभी अभी देखा उस पर उसको विश्वाश नहीं होता है और वह वापस अपनी माँ के सिरहाने के पास आकर बैठ जाता है । बैठे बैठे कब उसकी आँख लग जाती है उसको पता ही नहीं चलता है स्वप्न मे उसको वोही परी दिखाई देती है जो उसको आशीर्वचन देते हुए कहती है कि जब जब तुम मुझ को याद करते हुए अपनी मुरली की मधुर धुनें बजाओगे उतनी ही बार तुम्हे मेरी ओर से एक मणि , अपनी जेब मे, उपहारस्वरूप प्राप्त होगी ।और उसको बेच कर प्राप्त मुद्राओं से तुम भविष्य मे अपना बाकी जीवन अच्छी तरह से गुज़र बसर कर सकते हो। तुम्हारी माँ आज से पूर्ण स्वस्थ है और आज से तुम इस कच्ची झोपड़ी मे नहीं रहोगे आज से इसी जगह तुम पक्क़े घर मे रहोगे । सुबह जब हरिया की आँख खुलती है तो पाता है कि उसकी बूढ़ी माँ पूर्ण रूप से स्वस्थ है और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर रही है , घर के चारों ओर नजर डालता है तो पाता है कि उसके घर का नक्शा ही बदल गया है ,कायाकल्प ही हो गया। अब उसका कच्चा घर पक्के घर पर तब्दील हो चुका है । जेब मे हाथ डालता है तो उसको एक मणि प्राप्त होती है । अब वह उस परी को याद कर अपनी मुरली से मधुर तान छेड़ता है जो उस परी को मंत्रमुग्ध कर देतीं है और परी उसको अपने वायदे के अनुसार हर सुबह एक मणि देती।अब दिव्या परी धरती पर नहीं उतरती पर हरिया जब भी उससे मिलना चाहता तो वह पूनम की चाँदनी रात मे अपनी जेब से मणि निकालता और चन्द्रमा के सामने रख कर उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा अपने सामने पाता ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
११/०१/२०१५
लखनऊ । उ०प्र०


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