Saturday, 10 January 2015

पिंजड़ा

मेहरुनिशा की उम्र ही अभी कितनी हुई है मात्र 16 बसन्त ही तो देखें हैं बेचारी ने ,खिलती हुई कली अभी तो है वह ,जो वक्त के साथ कभी फूल बन कर चमन मे अपनी खुशबू बिखेरेगी पर यह क्या मेहरुनिशा की शादी तय हो गयी वह भी एक शेख के साथ जिसने भी इस खबर को सुना उसने दांतो तले ऊँगली दबा ली। खबर गाँव मे अब तक आग की तरह फ़ैल चुकी थी ,क्या नाई की दुकान और क्या पान की दुकान हर तरफ चर्चे मेहरू और उसके पिता असगर के हो रहे थे ,कुछ रिश्तेदार तो जलन के मारे दुखी दिखाई दे रहे थे -अब असगर रोज झोला उठा कर चलने वाले कामगार गरीब मजदूर नहीं रहेगा बल्कि अब वह गाँव का एक सभ्रांत मर्द कहलाया जाएगा ।सब उसकी किस्मत की दाद दे रहे थे।अब उसको रोज-रोज ट्रक मे लद कर शहर काम ढूँढने नहीं जाना पड़ेगा , कि कभी काम मिला तो दो वक्त की रोटी नसीब हो नहीं मिला तो पूरा परिवार फांके मारे उस दिन , अपितु अब वह अपनी प्रधानी भी पेश कर सकता था। मेहरूनिशा अपने छह भाई-बहनो मे सबसे बड़ी थी ,उसकी दूर की चच्ची ने यह रिश्ता तय करवाया था। बड़ी मुश्किल से उसकी चच्ची ने उसके माँ-बाप को पटाया था कि अगर शेख के साथ रिश्ता वे कबूल करेंगे तो उसके दिन तो फिर जावेंगे ही और साथ मे उसकी बाकी औलादें भी पार लग जायेंगी,लड़की विदेश में रहेगी और बदले में उनको दो लाख भी तो वह दिलवा रही है , मेहर की रकम के अलावा । माँ का दिल पहले तो उसे बाहर भेजने का नहीं था पर वह घर की माली हालात को देखकर मज़बूरी मे उसने हाँ कर दी। उधर मेहरुनिशा भी अपनी शादी की खबर सुन कर सकते में थी , अंदर ही अंदर घुट रही थी परंतु घर के हालातों ने उसे बड़ी दुविधा में दाल दिया था कि वह अपने बाप की उम्र के साथ शादी का उसका बिस्तर गर्म कर बच्चे पैदा करने वाली मशीन बने या जहर खाकर आत्महत्या कर ले । उस चच्ची को वह अन्दर ही अंदर कोस रही थी जो उसे कुछ ही देर पहले नसीहत दे कर निकली थी कि तेरे माँ ने तीन लड़कियां जनी हैं अगर तू हाँ कर देगी तो इनके भाग्य सुधर जायेंगे इन करमजलियों का भी बेड़ा पार लग जायेगा -साली यह औरत हमारी चच्ची है कि दल्ली जो मेरी बोली लगा कर बाज़ार में नीलाम करवा रही है । रात भर मेहर अपने बिस्तर पर इधर से उधर करवटें बदलती रही उसका ज़मीर उसे किसी के लिए नीलाम नहीं होने की इजाजत नहीं दे रहा था ,अब उसके पास कोई चारा नहीं था कोई रास्ता उसे नही सूझ रहा था - इधर कुआँ तो उधर खाई । मेहर ने अपनी नीलाम होती इज़्ज़त के लिए खाई को चुनना बेहतर समझा और अगली सुबह उसके घर वालों को उसकी लाश बिस्तर पर पड़ी मिली , मुँह से झाग निकल रहा था , देह ठंडी पड़ अकड़ चुकी थी। आत्म रूपी पंक्षी पिंजड़े से उड़ चुका था और शेष रह गयी तो मात्र मुरझाई कली जो मिट्टी के अंदर कुचली जा चुकी थी किसी वहशी के अपने स्वार्थ और लालच के कारण।


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
लखनऊ,उ०प्र० ।
०७ /०१ /२०१५

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