Tuesday, 20 January 2015

लघुकथा :- बेगाना घर
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बड़े अरमानों से पंडित आत्माराम जो कि एक आर्य समाजी हैं , ने अपनी बड़ी बेटी रश्मि की शादी एक विजातीय परिवार में, अपने ही विभाग के अधिकारी सुभाष जी, जो कि स्वयं एक सत्संगी हैं , के लड़के प्रभात से ,जो की सिचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत है , के साथ यह सोच कि सत्संगी परिवार है वहाँ उनकी लड़की हमेशा सुखी रहेगी , के साथ बड़े ही धूमधाम के साथ कर दी । शादी के कुछ समय तो रश्मि को उसके ससुराल वालों ने अपनी पलकों में बैठाया पर जब रश्मि की कोख से एक के बाद एक तीन लड़कियाँ पैदा हुई तो वही सत्संगी परिवार अपने वंश को बढ़ाने के नाम पर लड़का ना पैदा करने का दोष अब रश्मि के मत्थे मढ़ने लगा । सास ससुर व ननदों के ताने सुन कर तो रश्मि के कान पक गए थे । पर हद तो तब पार हो गई जब उसका पति रोज रात में शराब पीकर घर आता और उसके साथ मारपीट करता । इस बार रश्मि फिर से माँ बनने वाली है और ससुराल वालों ने उसके पति को सख्त हिदायत देते हुये उसे उसके पिता के घर छोड़ आने को कहा । और चलते वक़्त सख्त हिदायत दी कि अगर इस बार भी लड़की जनी तो उसे वापस इस घर पर आने की जरूरत नही। रश्मि ने अपने घर पहुँच कर अपने पिता को इतने सालों से ससुराल में अपने ऊपर हुए जुल्म को सुनाया तो बूढे बाप का दिल भर आया । पर मजबूर बाप कर भी क्या सकता था उसको अपनी छोटी बेटी की शादी भी तो करनी थी । अगर बड़ी लड़की को ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया तो समाज दस तरह की बातें बनायेगा ,उसके माथे पर कुलक्षणी , डायन और ना जाने कौन कौन से नामों से बड़ी बेटी को समाज बुलायेगा तो छोटी की जीवन नैय्या कैसे पार लगेगी । अगले दिन पंडित जी ने उसको अपने ससुराल वापस जाने का फरमान जारी कर दिया यह कहते हुए कि बेटी की डोली मायके से निकलती है और अर्थी ससुराल से । आज उसका घर जहाँ वह पली बड़ी और खेली थी अब वोही उसके लिए "बेगाना घर " हो गया था । आज वह ना घर की रही ना ससुराल की । अगले दिन मछुवारों ने रश्मि की लाश को नदी में बहते हुए पाया । रश्मि आज समाज की झूठी शान पर कुर्बान हो गयी थी ।
(पंकजजोशी)सर्वाधिकारसुरक्षित।
लखनऊ।उ०प्र०
२०/०१/२०१५


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