Saturday, 31 January 2015

लघु कथा:-दिल्ली मेट्रो

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राज भी और लोंगों की तरह प्लेटफार्म पर खड़ा मेट्रो ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है कुछ देर के बाद ट्रेन आई , रुकी और लोंगों का रेला उतरा और कुछ लोग चढ़ गए । ट्रेन ने अपनी गति पकड़ी और चल पड़ी नियत स्थान की ओर । एक स्थान पर मेट्रो रुकी , रात का वक़्त था सभी स्त्री और पुरुषों को अपने अपने घर पहुँचने की जल्दी है । कुछ खूबसूरत लड़कियों का झुंड चढ़ा और यात्रियों में घुल मिल गया । उनमे से एक ने मिनी स्कर्ट पहन रखी थी उसकी खूबसूरत आँखे व टांगे बरबस ही अपनी ओर किसी का भी ध्यान खींच लें कानों में मोबाइल फ़ोन के इयर प्लग , कंधे पर लटका लेपटाप बैग मानो वह किसी बड़ी कंपनी मे साफ्टवेयर इंजीनियर हो । चलती ट्रेन में अचानक कोई मुलायम हाथों की उंगलियाँ उसके मजबूत हाथों से अचानक टकरा जाती हैं और उसके रोमांच से राज के पूरे शरीर में एक लहर सी उठ जाती है सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है तभी अचानक ब्रेक लगने से गति पकड़ी हुई ट्रेन रुक जाती है और उस लड़की का शरीर राज से आकर टकराता है । आपस में सौरी बोलकर एक दूसरे के प्रति औपचारिकता निभाते हुए कनखनियों से देखतें हैं थोड़ी देर बाद स्टॉप आता है और , और लोंगों की तरह राज भी स्टेशन पर उतर कर , गुजरे हसीं पलों की यादों को संजोये तेजी से बाहर की ओर निकलता है और बाहर पहुँच कर वह ऑटो को बुलाता है। सहसा ही उसका ध्यान अपनी पेंट की पीछे की पाकेट पर जाता है और उस समय उसका सारा रोमांच काफूर जब उसे यह ज्ञात होता है कि उसका तो पर्स ही गायब है , पूरा शरीर पसीने से तर -बतर उसके तो पूरे महीने की उसकी सैलरी ही गुम हो चुकी थी । तभी उसे पीछे से कुछ लड़कियों के हंसने की मधुर आवाज सुनाई पड़ती है अरे यह तो वहीं लडकियाँ हैं जो उसके साथ मेट्रो के अंदर थीं , हाथों पर हरे हरे कागज के कुछ नोट गिन रही थी । ,जब तक वह अपनी प्रतिक्रिया करता उन्होंने ऑटो वाले को उन्होंने आवाज दी और उसमें बैठ कर चलते बनीं । सड़क के इधर उधर उसने नज़रें दौड़ाई तो सड़क के एक कोने में जमीन पर पड़ा उसे अपना खाली पर्स दिखाई दिया उसको यह समझते हुए जरा भी देर नहीं लगी हो ना हो इस जेबकतरी में उसी खूबसूरत टांगो और कोमल नाजुक उँगलियों का हाथ है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
31/01/2015

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