Wednesday, 28 January 2015

लघुकथा :- सोशल साईट

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सोशल साईट की दुनिया एक आभासी दुनिया होती है और यह आभासी दुनिया जितनी सच्ची होती है उतनी झूठी भी । इस रंगमंच के किरदार भी अनेक होते हैं , हर पल हर समय बदलते चेहरे कुछ मखौटे ओढे , तो कुछ लड़के व लड़कियाँ नकली प्रोफाइल बना कर चैटिंग करते साइबर कैफे में मजमा लगाये प्रायः मिल जायेंगे । आज यह आभासी दुनिया ख़त्म होने वाली थी क्योंकि विक्रम की फेसबुक फ्रेंड जिनको वह दीदी जी भी कहता है , उनका मेसेज आया था कि आज मैं आपके शहर में आईं हूँ , मुलाक़ात संभव है । तय समय पर उनकी मुलाकात होती है । वहाँ पर उसे अपनी तरह के दो चार और लोग भी मिलते , जो उसकी ही तरह एक ग्रुप से जुड़े हुए है । सब प्रसन्नता का अनुभव करते हैं कि रक्त संबंधो के अतिरिक्त यह भी उनका अपना ही परिवार है । आज महीनों से चली आ रही आभासी दुनिया समाप्त हो चुकी थी सब कुछ वास्तविक ,असली था ।
(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र० ।
27/01/2015

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