Saturday, 10 January 2015

स्नेह दीप

मोहिल आज जो कुछ भी है वह आज अपने गुरु आत्माराम की बदौलत है। आज वह इतनी बड़ी विदेशी कम्पनी मे सीईओ के पद पर कार्यरत है पर घमंड उसको लेशमात्र छू भी नहीं पाया ।अपनी रिलेखसिंग कुर्सी को दायें बायें घुमाते हुए अपने बीते हुए कल के बारे मे सोचने लगा कि वह फर्श से अर्श तक कैसे इतना आगे बढ़ गया,अनायास ही उसकी आँखे अपनी मेज मे सजी गुरु की तस्वीर की ओर घूम जाती है और वह उनको पलके झुका मन ही मन  श्रद्धा पूर्वक नमन करता है,दरअसल मोहिल गाँव के एक साईकिल के पंचर बनाने वाले का लड़का था ।पढ़ने मे रुचि और कुशाग्र बुद्धि होने के कारण आत्माराम ने उसके पिता को समझा बुझा कर उसकी सकिश का सारा भार अपने ऊपर ओड़ लिया और अपने संरक्षण मे ले लिया। शिष्य ने भी अपने गुरु के सम्मान मे कोई कसर नही छोड़ी और अपनी मेहनत व लगन से एक के बाद एक मिडिल ,हाईस्कूल फिर इंटरमिडियेट और बाद मे इंजीनीयरिंग की पढ़ाई पूरी कर नौकरी शुरू की। एक दिन उसे आत्माराम की लड़की माया का फ़ोन मोहिल के पास आता है कि पिता जी कई हालत नाजुक है ,मोहिल तुरंत पहली फ्लाइट को पकड़ अपने शहर फिर गाँव आत्माराम जी से मिलने पहुँचता है तो उसे उनके लिवर कैंसर से पीड़ित होने का पता कहऑल्ट है और वह अपने साथ दोनों को लेकर मुम्बई इलाज के लिए ले आता है ,और तन मन धन से उनकी सेवा सुश्रशा  करने लगता है। बड़े से बड़े डॉक्टर से परामर्श हो या दवाइयाँ मोहिल ने कोई कसर नहीं छोड़ी। एक बार आत्माराम ने मोहिल से कहा भी  कि व्यर्थ मे तुम यह प्रयास कर रहे हो अब मेरे जाने का समय है , यह एक लाइलाज बीमारी अब कब तक तुम अपने कंधे पर इस बूढे शरीर का बोझ उठाये फिरोगे । एक बात मैं तुमसे कहूँ आत्माराम ने मोहिल से कहा -जी गुरु जी आदेश कीजिये , मेरे बाद इस लड़की माया , की ओर इशारा करते हुए बोले , का क्या होगा ? मेरी आखरी इच्छा है देखो इनकार ना करना मैं चाहता हूँ कि तुम  हर तरह से योग्य , सुशील समझदार हो मैं इसका हाथ तुम्हारे हाथ मे देकर चैन की नींद सोना चाहता हूँ । मोहिल ने उनकी आज्ञा को सर आँखों पर लेते हुए तुरंत इसकी हामी भर दी और उनको आश्वाशीत किया कि मैं आज से माया के हर सुख दुःख का सहभागी हूँ ।आत्मा राम के आँखों के कोरों से अश्रु की बहती धार उनके आत्म संतुष्टि का परिचय दे रही थी और उन्होंने माया का हाथ मोहिल के हाथ में रख दिया ।आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया और उनदोनो के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि यह स्नेह का दीप सदा तुम दोनों के जीवन को आलोकित करता रहे फिर एक गहरी सांस भरी और सब शांत उनके प्राण पखेरू उड़ चले थे । अचानक मोहिल की तन्द्रा भंग होती है सामने देखता है तो रोमा फाइलों को पकडे खड़ी हुई थी - सर जरा इन फाइलों को साइन कर दीजिये , मोहिल ने चश्मा उतारा और आँखों से टपकते आसुओं को पोछने लगा तभी रोमा ने पुछा सर आपकी आँखों मे आँसू कुछ नहीं मोहिल ने फाइलों को साइन करते हुए कहा "स्नेहा दीप " क्या रोमा ने पूछा ,कुछ नहीं तुम नहीं समझोगी यह डिस्पैच मे दे दो  और फिर से अपने को काम मे व्यस्त कर लिया ।

(पंकज जोशी)
लखनऊ । उ०प्र०

०६/०१/२०१५

No comments:

Post a Comment