Thursday, 15 January 2015

लघुकथा :- विधवा
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संध्या की उम्र लगभग सत्रह साल की रही होगी ,जब उसने पहली बार युनिवेर्सिटी मे दाखिला लिया था । पहली बार कालेज जाने का अनुभव , नवयुवक व नयुवतियों मे ,एक परिंदे का पिंजड़े की कैद से बाहर निकल उन्मुक्त हवाओं से बातें करने के समान होता है । शांतनु से उसकी पहली मुलाक़ात क्लास मे ही हुई थी। दोनों ने साथ-साथ ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की । शांतनु के हँसमुँख रवैये और प्रभावशाली वाक्पटुता से संध्या खुद बखुद अपने को उसके करीब जाने से रोक नहीं पायी । ग्रेजुएशन की पढ़ाई खत्म करने के बाद इत्तेफ़ाक़ से दोनों को बैंक में साथ-साथ नौकरी भी मिल गयी । अब तो दोनों की रोज मुलाक़ात होने लगी कभी आफिस की कैंटीन,या ऑफिस के बाद उसकी बाइक के पीछे बैठ कर नदिया किनारे जाना,तो कभी किसी पार्क या काफी शॉप में जाकर बैठना देर तक बातें करना ।ज़वानी का अल्लहड़पन होता ही ऐसा है कि सारा ज़माना गलत होता है बस हम सही होते है ।जवानी में पलता प्यार और दहलीज के बाहर पड़ा एक गलत कदम दुनिया के सामने आपको शर्मिंदा कर सकता हैं । ऐसा ही कुछ संध्या के साथ भी हुआ । जब उसको अपने गर्भवती होने का पता चला। शांतनु तो शादी के लिये राजी नहीं था। पर संध्या के काफी दबाव के बाद बड़ी मुश्किल से वह उसके साथ शादी करने के लिए राजी हुआ । शादी की सुहागरात के समय शांतनु का शराब के नशे मे चूर लड़खड़ाते हुये कमरे के अंदर आना संध्या को चौंका देता है कि क्या यह वही शांतनु है जिसको वह चार -पांच साल से जानती है ।जिसके प्यार में पागल हो कर उससे शादी की । संध्या की आँखों से आँसू गिरने लगे और उसने अपना चेहरा शर्म से दोनों घुटनों के बीच छुपा लिया और मन ही मन बुदबुदाने लगी इतनी बड़ी गलती उससे कैसे हो गयी । वह एक शराबी से प्यार करती रही जिसके लिए उसने अपना तन मन सब समर्पण कर दिया उसने उसे इतना बड़ा धोखा दिया। अब पछताने से क्या लाभ वह तो उसके बच्चे की माँ बनने वाली है । खैर इस घटना को भी भाग्य का लिखा मान कर उसने परिस्थिति से समझौता करने का निश्च्य किया । उसने शांतनु को सुधारने के कई प्रयास किये पर शांतनु कहाँ सुधरने वाला था । रोज रात को शराब पीकर आना और संध्या से लड़ना झगड़ना और अगली सुबह संध्या से माफ़ी माँगना कि आज के बाद वह शराब को हाथ नहीं लगायेगा । संध्या भी रोज भगवान से प्रार्थना करती कि उसके पति को कुसंग से निकाल दें उसको सदबुद्धि दे दें जिससे उसकी शराब छूट जाये । एक दिन ऑफिस में शांतनु को खून की काफी उल्टियां हुईं संध्या उसको डॉक्टर के पास ले गयी। डॉक्टर ने बताया कि लीवर काफी खराब हो चुका है अगर इसी रफ़्तार से वह शराब पीता रहा तो वह बहुत जल्दी इस दुनिया को अलविदा कह देगा। लगभग दो-तीन महीने तो शांतनु ने शराब को हाथ भी नहीं लगाया और उसके स्वास्थ्य मे काफी तेजी से सुधार होने लगा । अब वह भला चंगा होकर फिर से नौकरी पर जाने लगा । लेकिन अच्छी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं । एक रात शांतनु फिर से शराब पीकर घर पहुंचा और घर पहुँचते ही उसको खून की उल्टियाँ होने लगी । जब तक संध्या उसको हॉस्पिटल लेकर पहुँचती तब तक रास्ते में ही उसकी गोद में उसने दम तोड़ दिया । सत्ताईस साल की कोमल संध्या के जीवन पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा था । वह अब अपने तीन साल के बेटे को लेकर अपने मायके आ गयी । ज़वान लड़की को विधवा देख कर उसके गम में संध्या के माता-पिता भी बहुत जल्दी ही स्वर्ग सिधार गये । अब उसकी ज़िन्दगी जीने का एकमात्र सहारा था तो उसका इकलौता लड़का जो माँ के अधिक लाड प्यार की वजह से ज़िद्दी होगया था । संध्या उसकी हर अनावश्यक इच्छा को पूरा करती। अपने बेटे की प्रत्येक इच्छा पूर्ति ने माँ को बेटे के प्यार में अँधा कर दिया था । और पिता की जगह जो संस्कार के बीज उसने अपने बेटे के अंदर रोपने चाहिये थे वो वह उसको नहीं दे पायी ।धीरे धीरे उसका लड़का कुसंगति का शिकार हो गया। अब उसका लड़का रोज शराब पीकर घर आने लगा है । आज संध्या रिटायर हो चुकी है । पर आज भी वह अपने बेटे से प्यार करती है और उसके पुत्र मोह ने उसे इस कदर अँधा बना दिया है कि वह आज भी उसकी अनावश्यक इच्छाओं की पूर्ति करती हैं । वह आज अपने लड़के को शराब पीने के लिये पैसे देती है ।
(पंकजजोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ ।उ०प्र०
१५/०१/२०१५


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