Saturday, 10 January 2015

इस प्यार को क्या नाम दूँ

सुनंदा को ऊँचाई से कभी डर नहीं लगा वह तो आसमान को छूना चाहती थी , उन परिंदों के समान , मदमस्त , निश्चिंत , सपने देखना और उनको पूरा करना ,आनंद के साथ अब उसको अपना भविष्य नजर आने लगा था , प्यार के पेंगें छोटी सी उम्र में परवान चढ़ने लगी थी । सब कुछ जल्दी पाने की  चाह ,परिवार के विरूद्ध विरोधी स्वरों ने मानों उसे उस उछंखृल नदी के  बहाव का रूप दे दिया था जो सभी नाते रिश्तो का तट बंधन तोड़ देना चाहती हो । कुछ दिनों बाद सुनने मे आया की दोनों ने मंदिर मे भाग कर शादी कर ली , सुनन्दा के इस कदम से उसके परिवार वाले बड़े नाराज हुए और उसको मरा मान कर पूरी तरह से उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया, शादी के कुछ ही समय के बाद सुनन्दा को आनन्द की असलियत पता चलने लगी कि किस अय्याश किस्म का व्यक्ति है और उसकी पहले की भी एक शादी से उसको बच्चा है मानो उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गई आनन्द के साथ उसकी इन्ही बातों से धीरे - धीरे यही प्यार अब तकरार का रूप लेने लगा और जब सुनन्दा माँ बनने वाली थी तो एक रात आन्नद उसको छोड़ कर चलता बना , नये शिकार की तलाश मे। अंदर से टूटी हर तरफ से संदेह के घेरे में घिरी सुनन्दा के पास ना तो घर वापसी संभव थी ना ही जन्म लेने वाले बच्चे की परवरिश करने की क्षमता ,और एक दिन उसने भी बच्चे को जनने के बाद उसको कूड़े के ढेर में फेंक कर उससे अपना पीछा छुड़ाते वह भी चल पड़ी नई मंज़िल की तलाश मे ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
०४/०१ /२०१५ रात्रि १२:१० am
लखनऊ। उ०प्र०

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