Saturday, 17 January 2015

लघुकथा :-दिलदार
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किशन सेठ की गिनती शहर के प्रतिष्ठित,नामी- गिरामी व्यक्तियों में होती है,जब सिद्धांत एक साल का बालक था तो उनकी पत्नी उमा की मृत्यु हो गयी थी। किशन सेठ ने दुबारा कभी शादी इसलिए नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि सौतेली माँ से शायद सिद्धान्त को सगी माँ की तरह प्यार ना मिले । इसीलिये उन्होंने सिद्धान्त को माँ व बाप दोनों का प्यार दिया । फिर भी जैसे-जैसे सिद्धान्त बड़ा होता गया उसको हमेशा, दिल के किसी कोने में , माँ की कमी सदा खलती । आज सिद्धान्त बालिग़ हो चुका है। अब वह अपने अच्छे बुरे का स्वयं ध्यान रखने लगा है। समय कब पंख लगा कर फुर्र हो जाता है पता ही नहीं चलता है । उसने वयस्कता की दहलीज मे कदम रखा ही था कि आज उसके पिता का भी देहांत हो गया। जो उसके नाते रिश्तेदार आये थे वे भी तेहरवीं की रसम पूरी होने के बाद अपने-अपने घर चले गये। अब आज सिद्धान्त अपने को अनाथ महसूस कर था । दिन भर उसको इतना बड़ा घर काटने को दौड़ता है। अतः उसने अपनी ही तरह से अनाथ,असहाय ,निर्धन , गरीब बच्चों का सहारा बनने का फैसला किया। और उसने अपने पुस्तैनी व्यवसाय को तिलांजलि दे दी और अनाथ असहाय गरीब बच्चों को पढ़ाने उनकी दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके इसलिये उसने अपनी सारी प्रापर्टी को ट्रस्ट में कन्वर्ट कर दिया । आज सिद्धान्त अपने को अकेला महसूस नहीं करता अब उसका घर रोज बच्चों की चहल पहल से गूंजा व महका करता मानो जैसे रोज कोई उत्सव या त्यौहार का दिन हो । सिद्धान्त और गरीब बच्चे दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं । सिद्धांत के इस त्याग व तपस्या से आज सारा शहर उसका प्रशंसक बन गया है । और उसके इसी त्याग के कारण लोग उसको प्यार से दिलदार सेठ के नाम से पुकारने लगे हैं ।


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ । उ०प्र०
१६/०१/२०१५

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