Thursday, 19 February 2015

लघुकथा :- अस्तित्व
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बचपन से ही माँ की तबियत खराब होने के कारण बूढ़े दादा-दादी , पिता व भाइयों की सेवा और बड़े होंने पर शादी और शादी के बाद ससुराल की जिम्मेदारियों ने अकस्मात ही सिमरन के चेहरे पर झुर्रियाँ ला दी थी ।

वह आगे पढ़ना चाहती थी पर सास ससुर के रूढ़ि वादी विचारों के आगे वह नतमस्तक हो गयी थी ।
आज उसके बच्चे बड़े हो चुके हैं और सब ठीक- ठाक अपनी-अपनी गृहस्थी में रमे हुयें हैं ।
सिमरन ने आज बी०ए० में दाखिला ले लिया है । और इस बार उसके पति भी साथ हैं अपनी पत्नी के अस्तित्व की खातिर ।

( पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
19/02/2015

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