Saturday, 21 February 2015

लघुकथा:-  गृहशोभा 
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जब वह पैदा हुआ तो बाप को समझ नहीं आया कि थाली पिटवाये या नहीं खैर उस समय वक़्त की नज़ाकत देख लड़का बोल कर थाली तो पिटवा दी ।

कुछ हफ्तों बाद उसने गाँव की सारी जमीन बेच रिश्तेदारों से शहर में अच्छी नौकरी का बहाना बना कर शहर चला आया । पति व पत्नी को समझ में नहीं आ रहा था कि इस नवजात शिशु को लड़का कहें या लड़की ।
एक बार तो वह उसको नदी में प्रवाहित करने जा रहा था तभी उसकी अंतरात्मा ने उसको झकझोरा मूर्ख ईश्वर के अंश को मार रहा है , यह तो कृपा है उसकी
वह उसको घर ले आया और लालन पालन करने लगा । जैसे जैसे समय व्यतीत होने लगा बालक के शारीरिक अंगो का विकास होने लगा। बढ़ते अंगो के विकास के प्रति बालक की जिज्ञासा व उसकी मनो दशा माता पिता से अधिक देर तक छिपी ना रही और उसके हाव भाव , बोलचाल के कारण आधुनिक चिकित्सा विकास के चलते उसे पूर्ण लड़की का स्वरुप दे दिया । आज वही लड़की किसी के घर की लक्ष्मी हैगृहशोभा है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित
लखनऊ । उ०प्र०
21/02/2015


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