Tuesday, 24 February 2015

लघुकथा :- त्रिकोणीय प्रेम
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मात्र उन्नीस बरस की है रोशनी, कालेज जाती है । यह उम्र ही ऐसी होती है कि कक्षा में पड़ने वाला हर नवयुवक और युवतियाँ भावनाओं में बह कर अचानक ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो कर दोस्ती कर लेते और अपना अलग ग्रुप बना लेते हैं । जो अक्सर कालेज की कैंटीन हो या फिर सिनेमा घर या शॉपिंग मॉल साथ बैठे मिलते हैं ।

राघव और संजीव भी रोशनी के साथ पढ़ते थे और तीनों ही अच्छे दोस्त थे । रोशनी अपनी हर छोटी और बड़ी बातें आपस मे इनसे साझा किया करती थी ।
आज कालेज का आखिरी दिन है। अचानक राघव की नजर कैंटीन के बाहर बरगद के पेड़ के नीचे रोशनी का हाथ पकड़े संजीव पर पड़ी । मानो उसके तनबदन में आग लग गई हो और वहअनजान बन वहाँ से चला गया ।
कुछ दिनों बाद उसने बातों बातों में संजीव से रोशनी और उनके बीच पनपते हुए प्यार के बारे में पूछा । जिसको संजीव ने मजाक में लेते हुए हाँ कह दिया ।
कुछ हफ्तों बाद राघव का संजीव के पास फ़ोन जाता है कि उसकी कार किसी सुनसान जगह पर खराब हो गई है । अगर वह अपनी गाड़ी ले आये तो उसकी बड़ी मदद होगी । सारी रात संजीव घर से गायब था उसके घर वालों को चिंता हुई तो थाने जाकर रपट लिखवा दी ।
आज सुबह सुबह रोशनी अपनी माँ को डॉक्टर को दिखलाने हस्पताल ले जा रही थी कि तभी सामने से एक बाइक वाले ने जिसने काला हेलमेट पहना हुआ था । रिक्शे के सामने अपनी गाड़ी को खड़ा किया तरल पदार्थ रोशनी के चेहरे पर फेंका और वहाँ से भाग खड़ा हुआ ।
कुछ दिनों बाद पुलिस ने राघव को धर दबोचा उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया था ।
पर क्या संजीव वापस आ सकता है ? क्या रोशनी का खूबसूरत चेहरा उसके जुर्म को कबूलने से वापस पहले जैसा हो सकता है ?
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
25/02/2015


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