Monday, 9 February 2015

लघुकथा :- उम्र दराज  प्रेमी
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इतनी उम्र हो गयी अम्मा बाबू जी को देखो तो मेरी उम्र की लड़की के साथ गुलछर्रे उड़ा रहें हैं क्या कहेंगे मेरे ससुराल वाले जब उनको बाबू जी की हरकतों के ........मैं तो सोच के ही शर्मिंदा हो रही हूँ ।

तभी दरवाजे पर से आवाज आई "कुछ नहीं सोचेंगे रौशनी दी "।
आप कौन हैं ? रोशनी ने छूटते मुंह सवाल दागा ।
जी मेरा नाम मेघा है और मैं बगल वाले कम्पाऊंड में रहती हूँ । और जैसे ये आपके पिता हैं वैसे ही यह मेरे लिये भी पिता तुल्य हैं , मैं बाहर से यहाँ जॉब करने आई हूँ। एक बार रास्ते में कुछ आवारा लड़कों ने मेरे साथ छेड़कानी की थी । बस तब से यह मुझे सुबह बस अड्डे छोड़ने व लेने जाते हैं बिलकुल एक पिता की तरह चूँकि आज मैं ऑफिस से जल्दी चली आई तो सोचा बाबू जी को बताते चलूँ वरना नाहक ही वह शाम को परेशान होंगे मुझे बस अड्डे पर ना देख कर। मेघा बोली चली जा रही थी और रोशनी चुपचाप सन्न सुनती जा रही हो मानो उसके मुँह मे दही जम गया हो ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
09/02/2015


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