Wednesday, 25 February 2015

लघुकथा :-  धर्मांतरण
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ग्रामीणअंचल में आज बड़ी भीड़ जमा है । शायद कोई जादूगर आज चमत्कार दिखा रहा है। मुझे भी कुतूहल हुआ और मैं भी भीड़ को चीरते हुए ठीक सामने जा खड़ा हुआ देखा तो एक पादरी एक हाथ में मिट्टी के हनुमान की मूर्ति और दूसरे हाथ में लकड़ी का क्रास और सामने पानी से लबालब टब एक बड़ी सी मेज पर रखा है ।

पादरी बोला "गाँव वालों तुम्हारा भगवान अधर्मी है , झूठा है ,दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और तुम जहाँ पहले थे वही आज भी हो ।" "देखो तुम्हारे हनुमान जी अब स्नान करेंगे " कह कर उसने मूर्ति को टब में डाला थोड़ी देर में मिट्टी गल गई और हनुमान जी डूब गये । थोड़ी देर बाद उसने लकड़ी के क्रॉस को पानी में डाला और क्रॉस तैरने लगा। देखा गाँव वालों तुम्हारे आराध्य जिनकी तुम पूजा करते हो डूब गए और हम सबके प्रभु यीशु देखो तैर रहें हैं । आओ प्रभु यीशु की शरण में आओ उनका नाम ले कर तुम सबका इस पवित्र पानी से बपतिस्मा करता हूँ ।
दूर खड़ा एक विज्ञान का विद्यार्थी अपने अध्यापक के साथ इस तमाशे का मजा ले रहा था । वह टब के पास पहुंचा और उसने सलीब को सीधा खड़ा कर पानी में डाल दिया । 
गाँव वाले चिल्लयाये अरे ! पादरी के भगवान भी डूब गए ।
अरे मूर्खो किसी के भगवान नहीं डूबे तुम लोंगो की अक्ल में पत्थर पड़े हुयें हैं वे डूबे हैं । यह कोई चमत्कार नहीं विज्ञान है । पास में खड़े कालेज के मास्टर साहब गाँव वालों को फटकार रहे थे ।
पादरी ने चुपचाप खिसकने में अपनी भलाई समझी । धरमान्तरण यहाँ ना सही चलो कहीं और सही ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
25/02/2015



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