Friday, 5 June 2015

लाल किला -
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न्नत में भी शाहजहाँ को सुकून ना था , मुमताज उसी की कब्र के बगल में लेटी हुई थी , फिर भी बादशाह की आँखों से नींद कोंसो दूर थी ।

उसे चैन की नींद सोये कई शताब्दियां बीत चुकी थीं पर उसे नींद नहीं आ रही थी ।
आखिर एक रात उसकी प्यारी बेगम ने उसका हाथ अपने हाथो में लेते हुए पूछ ही लिया – जिल्ले इलाही ! हमको धरती छोड़े कई साल हो गए पर मैं सालों से देख रही हूँ कि अरसे गुजरे हुये आपको चैन की नींद सोये देखे हुए !

आखिर क्या कारण है हमारी औलाद औरंगजेब जिसने मेरे गुजरने के बाद आपको कैद कर हमारे बेटों को मौत के घाट उतार दिया ?

" नहीं  बेगम यह बात नहीं है " मैंने हिन्दुस्तान में तीन लाल किले बनवाये थे पर उनमे से एक दिल्ली का ही ही विश्व प्रसिद्व क्यों है ? हमारी प्यार की निशानी ताजमहल के सामने किला या लाहौर का क्यों नहीं ?

हूँ " आलमपनाह बस इतनी सी बात " राजनीति प्यार में जो हावी हो गई । उठ कर मुमताज गुस्से में अपने पैर पटकते हुए अपनी कब्र में सोने चली गई ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
 लखनऊ । उ.प्र

05/06/2015

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