Saturday, 17 October 2015

डर

" अरे वाह ! देखो तो सही श्रीमती जी आज की लड़कियों के चेहरों  को , आत्मविश्वाश से भरपूर देश की रक्षा के लिये कुछ भी कर गुजरने को तैय्यार हैं । " समाचार पत्र में छपे चित्र को दिखाते हुए शर्मा जी बोले ।
तभी पीछे से प्रीति की आवाज सुनाई पड़ी " माँ ! शाम को कालेज से आने में जरा देर हो जायेगी फेयरवेल पार्टी है ।
 " कोई जरूरत नहीं फेयरवेल पार्टी में जाने की क्लास खत्म होने के बाद सीधा घर आना समझी !  " पर बाबू जी फेयर वेल पार्टी तो हम लोंगो के लिये है और अभी आप ही तो कह रहे थे आज कल की लड़कियाँ आत्मविश्वाश से भरी हुई हैं " 
" पेपर में जो कुछ भी छपता है वह सब सच नहीं होता समझी " आँखें तरेरते हुए शर्मा जी बोले ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

Wednesday, 14 October 2015

स्वत्व


" क्यूँ री तेरे खान पान रहन सहन में क्या कमी रखी जो तू हमें ही आँखे दिखा रही है । " 

" तूने कोई कसर नहीं छोड़ी मौसी पर मैं आँखें बंद कर उस लड़के को हाँ भी नहीं कह सकती । ऐसे व्यक्ति से जिसका अपना कोई अस्तित्व ना हो  मैं उसके साथ ज़िन्दगी कैसे गुज़ार दूँ ? तुम्ही बताओ ?

" ऐसा ना हो कि तुझे कल पछताना पड़े ।  " " पछताना कैसा मौसी क्या समाज के लिये स्वयं की बलि चढ़ा दूँ ? बगैर स्वत्व का भान किये ? "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१४/ 10 / २०१५

Tuesday, 13 October 2015

अहं

" सुनो जी आज से अपने भैय्या से कह देना कि मुझसे रौब से खाना पीना मत माँगा करें ।  मेरी शादी तुम्हारे संग हुई है तुम्हारे घर वालों के साथ नहीं ! " 

 " पर उमा मैं यह कह सकता हूँ भाभी को गये अभी महीना भर नहीं हुआ है ऊपर से बिट्टू भी तो छोटा ही है क्यों  तुम बच्चे को स्वयं अपना लेती । "

" मैंने दुनिया जहाँ का ठेका नहीं ले रखा सोमेश कल मैं अपने माँ के घर चली जाऊँगी जब तुम्हारे भैय्या का इंतजाम हो जाये तो मुझे बुला लेना " 

पर ऐसी निष्ठुर तुम कैसी हो सकती हो तुम भी तो एक स्त्री हो । 

तभी उन्हें पीछे से बड़े भैय्या की आवाज सुनाई पड़ी - बहू ! तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं मैं कोई ना कोई इंतेजाम कर लूँगा भाग्य की मार के आगे तुम्हारे वचन फिर भी अच्छे हैं ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/10/2015

Thursday, 8 October 2015

किट्टी पार्टी

"मिसेज दीक्षित मैंने सुना है कि आप चुनाव लड़ रही हैं ? "  " सुना क्या मतलब जमुना पार का टिकट मुझे  मिला है मिसेज श्रीवास्तव । " अपने गले का हार ठीक करते हुए बोलीं ।


" पर आप कब से समाज सेविका बन गईं अरुणा जी ! " वोदका का शॉट मारते हुए बोली । 

" अरी मिसेज श्रीवास्तव आपका बचपना कब जायेगा ! क्या समाज सेवा के लिये चुनाव लड़ा जाता है ? गुस्से से मेज पर पत्ते पटकते हुए बोली "ट्रेल है!"


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।



लखनऊ । उ०प्र०



०८/१०/२०१५

Monday, 28 September 2015

विधर्मी खून

हैजा का प्रकोप ऐसा फैला  कि  पूरा गांव उसकी चपेट में आ गया । शन्नो ताई भी उससे अछूती ना रही । शन्नो ताई को अफसोस था उस दिन पर जब रमा आई थी जागरूकता के लिये  और उसने , 

" ए रमा ! चल हट यहां से  ! भाग यहां से  नासपीटी फ़ौज को ले कर के ! हमारे कुंए को हाथ भी ना लगाना , हमे कोई दवा-ववा नहीं डलवानी  तेरे से। " 

" पर ताई ! अगर कुँए का पानी साफ़ नहीं किया गया तो गांव में हैजा फैलने का डर है । "

" मुझे सिखाती है करमजली ! शहर जा कर चार अक्षर क्या पढ़ आई  मुझको अंग्रेजी सिखाती है ।  "

" बड़ी आई डाक्टरनी कहीँ की  मुझको अक्ल सिखाने आई है । उस समय तेरी अक्ल किधर चरने चली गई थी जब तूने उस विधर्मी के साथ मुँह काला करके हमारी नाक कटा कर चली गई थी । हमको बुढापे में सिखाएगी जाति पात , धर्म भेद ? "
 "अरे ओ सुखिया दो लठैत बिठा दे इहाँ पर और देखो कउनो हमार पानी ना छुएं । " 
आज उस दिन को याद करते हुए वो आत्मग्लानि की अनुभूति कर रही थी । 

तभी  वार्ड में रमा उनका चेकअप करते हुई बोली  "ताई अब तुम बिलकुल ठीक हो तुम अपने घर जा सकती हो लेकिन तुमको गाँव में अब कौन अपनायेगा ? "  तुम  तो अशुद्ध हो गईं जो खून तुम्हारी रगो में बह रहा है वह तो तुम्हारे विधर्मी दामाद का है । अब तो तुम्हे मेरे साथ ही रहना पड़ेगा। " रमा ने चुटकी लेते हुए कहा ।
" नासपीटी कहीं की मुझसे ठिठोली करती है ! " ताई ने प्यार भरी चपत उसके गाल पर मारते हुए कहा ।

पंकज जोशी  ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

लखनऊ । उ०प्र०

28/09/2015

Sunday, 13 September 2015

वक़्त     
--------------------------
दरवाजे पर घण्टी बजा कर जैसे ही  पार्सल वह अपने झोले से निकालने ही वाला था कि सामने उसने रेखा को खड़ा पाया । उसकी आँखों के सामने बीता कल घूम गया था । अरे यह तो वही पगली है जिसे सारे बच्चे पाठ शाला में चिढ़ाया करते थे ।

" आज यह सेठानी बन गई वाह री तकदीर ।

अनजान  बन चुपचाप उसने विदेश से आया पैकेट  निकाला , कागज में हस्ताक्षर करवा कर वह जैसे ही चलने को हुआ । उसके कानों को इक कोमल आवाज सुनाई पड़ी । " एक मिनट भैय्या जरा रुकिए तो सही मैं अभी आती हूँ !  सेठानी ने हाथ से उसे इशारा करते हुए कहा और अंदर चली गई "

थोड़ी देर में वह हाथ में  एक छोटा सा पैकेट लेकर आई " यह भाभी जी को दे  दीजेगा , और कहियेगा यह उनकी पगली ननद ने भेजा है । 

" आज उसे यह शहर पराया नहीं लग रहा था । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/09/2015

Thursday, 3 September 2015

उर्मिला की व्यथा 
--------------------
आज राज्य की सड़के सूनी हो पड़ी हैं , तीन सधवायें को अकारण ही वैधव्य को प्राप्त होना पड़ा , अनजाने में किया एक ऐसा प्रण जिसके फलस्वरूप पुत्र विछोह का दंश महाराज सहन ना कर  सके और प्राण त्याग दिये । प्रजा बिना राजा के अनाथ हो गई ।

पर महल के कोने में बैठी उस फूल सी कोमल स्त्री का क्या दोष ? जो उसको सधवा होते हुए भी श्रृंगार रहित हो , भगवा वस्त्र धारण करना पड़ा।

रानी से उसका कुम्हलाया चेहरा देखा ना गया वह उसको गले लगाते हुए बोली " यह तो विधि का विधान है जो टाला नहीं जा सकता "

कांधे में सिर रखी कन्या के सब्र का बाँध टूट चुका था " माँ ! यह कैसी वचनों को निभाने की कुल रीति है  जिसका वनवास मुझे अगले चौदह साल तक एक विधवा की तरह निभाना होगा । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
03/09/2015