Saturday, 29 August 2020

दुआ का असर


कोई उनसे अगर उनका मजहब पूछे तो वह मुसलमान थे, वह भी पांचो वक्ति , मजाल है कि कभी नमाज ना अदा की हो और पेशे से वह एक सच्चे इंसान यानि डॉक्टर। "डॉक्टर साहब मेरी बीमारी कब ठीक होगी ? हीरा ने थके मांदे स्वर मे सीधा प्रश्न कियावह इसका उत्तर देते कि तभी कम्पाउंडर तपाक से बोल पड़ा "मरने पर ही बीमारी आपका पीछा छोड़ेगी" उसकी नादानी भरी बात  सुन कर उधर बैठे मरीजों के चेहरों पर हँसी बिखर गई पर डॉक्टर साहब  गम्भीर मुद्रा मे बैठे कुछ सोच रहे थे कई बार अपनी मेज की दराज खोलते पुस्तक निकालते कुछ पन्ने पलटते उसको रखते दूसरी किताब निकालते फिर उसके पन्ने पलटते  करीब घण्टे भर तक क्रम ऐसी ही चलता रहा। मालूम पड़ता था कि मर्ज गम्भीर है हीरा की दयनीयता  कुछ ऐसे ही भाव बतला रहा थी। 

डॉक्टर साहब ने पुस्तक अपनी छाती पर रख कर आँखे बंद की, मानो वे किताब को छाती पर रख के अपने रब से दुआ मांग रहें हो, थोड़ी देर उन्होंने कुछ सोचा कलम उठाई फिर पर्चे पर कुछ लिखा "चलो दवा बनाओ "

खिड़की से छन कर आती रोशनी उसे आशा की किरण प्रतीत हो रही थी। 


पंकज जोशी

सर्वाधिकार सुरक्षित। 

लखनऊ। उ०प्र०

२९/०८/२०२०

Thursday, 9 August 2018

गर्म हवा

वह ठीक नियत समय पर उसके कालेज के सामने गाड़ी पार्क करके उसकी राह देखता रहता, अपनी सहेलियों से बहाना बनाते हुए वह उसके पास जाकर बोली ' कितनी बार तुमसे कहा है कि तुम रोज मेरे कालेज मत आया करो,यह तो कहो मैंने उनसे कह रखा है की तुम मेरे ममेरे भाई हो, अगर भेद खुल गया तो मेरी कितनी.....' बात को बीच में ही काटते हुए वह बोल पड़ा' प्यार भी करती हो और डरती भी हो, अरे हम आधुनिक युग में जी रहे हैं कि पुरातन युग में'जबतक उसकी बात खत्म होती तब तक उसने अपने मुँह को कपड़े से ढका और बाईक में सवार होते हुए गोली की तेजी से बोली'अब चलो भी जल्दी से ना।' 
सारी यादें एक  चलचित्र की भांति उसके सामने घूम रही थी घर से दूर वह कॉलेज में अपना कैरियर बनाने आई थी पर तकदीर को कुछ और ही मंजूर था, प्रेमी से पाये धोखे ने उसे अंदर से तोड़ दिया था, कि अचानक एक आवाज ने उसकी तन्द्रा तोड़ी ' यह बच्चा आपको कहाँ मिला?
अनाथाश्रम की केयर टेकर ने सवाल दागा, जी इसे रात में कोई हमारे द्वार पर छोड़ गया क्या बतायें जमाना बड़ा खराब है इस मासूम की हालत तो देखिये मुझसे रहा नही गया इसलिये सीधे आपके पास चली आई , अच्छा अच्छा यह फार्म आप भर दीजिये उसने  एक पल उसकी ओऱ देखा कंचन का कुम्हलाया चेहरा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था देखते हुए बोली 'क्या किया जाये आजकल हर ओर गर्म हवा जो बह रही है, जी आप सही कह रही हैं' प्रतियुत्तर देते हुये उसने फार्म पकड़ाया और कदम तेजी से अनाथालय से बाहर की ओर निकल पड़े।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
19/06/2018
लखनऊ, उ०प्र०

Friday, 11 August 2017

नई पौध

'देखो ना! मनीष की अम्मा, यह पेड़ भी सूख गया खच खच खच जमीन पर खुरपी घिसते हुए उसने सड़े पेड़ को बाहर फेंकते हुए कहा।

'अरे पौधों को खाद-पानी के अलावा प्यार दुलार की भी आवश्यकता है ,यह काम रोज का है और तुम हो जब मर्जी की तो खुरपी पकड़ ली कभी पानी दिया तो दिया नही तो भगवान भरोसे।' तंज कसते हुए पत्नी बोली

मैं क्या कह रहा था कि अपनी हालत भी इन पेड़ों की तरह हो गई है- जवान बच्चे विदेशो में बस गये हैं अच्छा कमाते हैं कभी कभार फोन में हालचाल ले लेते हैं खर्च भी भेज देते हैं पर इन सबके अलावा भी तो ......कहते कहते वह रुक गया..... 

'अरे लो तुम तो अपने बच्चों को कोसने लगे' याद करो वह दिन जब बाबू जी के ईलाज के लिये हमारे पास पैसे नहीं होते थे अपने जेवर गिरवी रखे थे मैंने , तुम्हारे छोटे भाई बहनो की पढ़ाई .....उनकी शादी ......संयुक्त परिवार था हमारा। लेकिन तुम्हारे भाई-बहन तो पूछते तक नहीं हमें एक ही शहर में तो रहते हैं हम' कहते हुए उसकी आँखों में आंसू भर आये ...

'अरे तुम भी कहाँ की बात लेकर बैठ गई अपने मिश्रा जी को देखो कितने भाग्यशाली हैं , छींके नही कि बच्चे दवाई लेकर दौड़ पड़ते हैं'
'-खुरपी को साफ करते हुए वह बोला

'निक्कमें हैं अपने बाप की पेंशन तोड़ रहे हैं' झुंझलाते हुए बोली

'चलो बहुत हुई बागवानी-पंखी उड़ाते हुए बोली अंदर चलो तुम्हारा शरीर कांप रहा है तुम्हारे लिये कॉफी बनाती हूँ' उसने हूँ कहते हुए गर्दन हिलाई और दोनों वृद्ध एक दूसरे को कंधे का सहारा लेते हुए घर के अंदर प्रवेश करने लगे।

(मौलिक व अप्रकाशित)सर्वाधिकार सुरक्षित।
पंकज जोशी
१०/०८/२०१७

Sunday, 14 May 2017

विरह

'अरे अपरा! सड़क के दूसरी ओर उसे कोई दूर से हाथ हिलाता हुआ आवाज दे रहा था। तेज धूप में उसने चेहरा पहचानने की नाकाम कोशिश की, तभी विवेक उसके पास भागता हुआ आया, पहचाना मुझे? उसने पूछा, 

'नहीं मैंने नही पहचाना आपको, कौन है आप और इस तरह आपको बीच सड़क में मुझसे क्या काम है ?'

'अरे आपने तो मुझे सचमुच नहीं पहचाना? फिर बताने से क्या फायदा , अगर आप अपरा जो स्कूल टीचर है तब तो मैं सही हूँ, ओके!कोई नहीं मैं आपको डिस्टर्ब करने के लिये माफ़ी मांगता हूँ बॉय..... वैसे मैं अनुज का दोस्त हूँ।'

'सुनिये!रुक जाइये एक मिनट के लिये मैं माफ़ी चाहती हूँ दरअसल काम के टेंशन में मुझे कुछ याद नहीं आ रहा , वैसे आप उनको कैसे जानते हैं?'

'अगर आपको कोई दिक्कत ना हो तो क्या हम किसी रेस्त्रां में बैठ कर बात कर सकते हैं?, श्योर यहीं पास ही में है वैसे भी धूप तेज है उसने प्रत्युत्तर दिया।'

देखिये अनुज मेरी ही यूनिट में मेरा जूनियर था और  जहाँ तक मैं सही हूँ तो मैंने उसके साथ जो आपकी फोटो देखी है शायद आप उसकी दोस्त से बढ़कर थीं? पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था.....एक काम्बिंग में शहीद हो गया।

गहन चुप्पी को तोड़ती आवाज उसके कानों को सुनाई पड़ी 'सर काफी देर हो चुकी है,अब हमें चलना चाहिये, माँ -बाबा इंतेजार कर रहे होंगें।'

आइये मैं आपको अपनी गाड़ी से घर तक छोड़ देता हूँ , उसने आगे बढ़ कर अपनी कार का दरवाजा खोला और उसमें बैठ कर दोनों घर की ओर चल पड़े ।

'आगे से राइट और फिर लेफ्ट लेकर सीधे राइट और वह जो लाल रंग का घर दिख रहा है ना आपको वही मेरा घर है।'
वह उसे रास्ता बताती हुई जा रही थी, कार ठीक जैसी ही घर के सामने रुकी उसने कार का दरवाजा खोलकर बाहर उतर गई। 

गेट के बाहर नेम प्लेट पर कैप्टन अनुज शर्मा लिखा देख कर वह चौंका, उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, ना चेहरे पर कोई मेकअप, ना कोई सिंदूर, यह क्या एक विधवा का जीवन? उसने अपने आप से कहा।

'रुकिये अगर बुरा ना माने तो एक बात पूछूँ आपकी तो उससे शादी भी नहीं हुई थी फिर आप ....यह ?, आप नहीं समझेंगें सर .... अच्छा मैं चलती हूँ , नमस्ते।'

बिल्कुल शांत थी वह मानो कुछ हुआ ही ना हो, तूफ़ान आया और चला गया सामने कर्तव्यों की भेंट चढ़ती हुई एक बेटी शेष रह गई थी ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
लखनऊ । उ०प्र०
१३/०५/२०१७

Tuesday, 9 May 2017

लालसायें

उसने गरीबी देखी थी। बूढ़े माँ-बापू को अपनी बाहों में दम तोड़ते देखा था उसने कसम खा ली थी कि अब वह जीवन में  कभी पलट कर नहीं देखेगा।

"अब आत्मा की भी नहीं सुनूंगा, चाहे कुछ भी हो जाये समय को पलट दूँगा , पैसे में बड़ी ताकत होती है तो यही सही, अब यह लक्ष्मी मेरी होगी" यह बात उसके दिमाग में घर कर चुकी थी।

समय ने भी अपना पलटा खाया आज वह एक कम्पनी का मालिक बन चुका था। शहर में उसकी इज्जत थी। 

सब पा लिया लेकिन आत्मा...!  उम्र भर उससे दूर भागता रहा पर वह थी कि उसका पीछा ही नहीं छोड़ रही थी। 

"रोज रोज मैं तुम्हारी बकवास सुन-सुन के थक गया हूँ, भाग जाओ यहाँ से, अपना यह लेक्चर नाकाम लोगो को जाकर सुनाओ मुझे नहीं, देखो दुनिया की सारी खुशियाँ आज मेरे कदम चूम रहीं है!" वह चिल्लाया. 

"मैं अपने धर्म से विमुख नही हो सकती, तुम्हे छोड़ कर नहीं जा सकती, जिन अभावों को तुम दूर भगा देना चाहते थे, क्या वास्तव में उसे भगा पाये? क्या तुम्हारी ज़िंदगी में सुकून है?" वह पसीने-पसीने हो उठा. 

वह लगातार बोलती जा रही थी,"तुम्हारी अपूर्ण लालसायें ही तुम्हारी अशांति का कारण हैं जो पूरा होने का नाम नहीं लेती, ना जाने कितनों की छाती को रौंद कर तुम अपने को स्वयम्भू समझ बैठे हो, क्या डॉली भी तुम्हारी भूख का शिकार होगी?"
 "हाँ, मेरे रस्ते जो आयेगा सबको लील जाउंगा!" 
 "उस बेचारी का कसूर क्या है, बस इतना ही कि उसने तुमको चाहा है तुमसे प्यार किया है" 
" प्यार  किया तो क्या!" 
 "बेचारी बड़ी भोली है कम से कम उसको तो बख्श दो।" 
"नहीं, मुझे सिर्फ जितना है , प्यार हारना सीखाती  है ,मैं किसी हाल में हार नहीं सकता हूँ, तुम  कौन होती  हो मुझसे ऐसे सवाल करने वाली?" 
 "सुना नही तुमने सुनील, मैं अभी जिन्दा हूँ मैं तुम्हारी आत्मा हूँ।"

"नहीं नहीं तुम कैसे जिन्दा हो सकती हो तुम्हें तो मैंने बरसों पहले ही मार दिया था  तुमको मार कर ही तो मैंने सफलता का स्वाद चखा था।"

"काश, तुम मुझे मार पाते और समझ पाते जिसे तुम सफलता मान रहे हो वह तुम्हारी विफलता है।" 

उसने क्रोध में बोतल उठाई और दीवार पर दे मारी । हारा हुआ खिलाड़ी कांच के टुकड़े में हर जगह दिख रहा था ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित 
लखनऊ । उ०प्र०
०९/०५/२०१७

Monday, 8 May 2017

चलें गाँव की ओर

"यह कैसी ज़िंदगी है जहाँ ना खाना पीना ना कपडा लत्ता कुछ भी नसीब नहीं है । गाँव तो हमने अपनी तरक्की के लिये छोड़ा था पर अपना नसीब ही खोटा है रोज सुबह उठ कर बम्बे पर पानी के लिये मारा मारी ,वह नई पड़ोस में जो आई है वह तो इतनी भद्दीभद्दी गाली देती है राम राम ..."
कानों में ऊँगली डालते हुये बोली ।

"अरी भागवान दो कौर रोटी के तो आराम से तो खाने दे , हाय! मैनें कब तुम्हे  खाना खाने से रोका, तुम फैक्टरी चले जाते हो घर पर मैं अकेली रह जाती हूँ अब दिन भर किससे अपने मन की बात कहूँ,एक तुम हो जो वापस आ कर खाना खाते और चुपचाप सो जाते हो बिल्कुल मशीन हो गये हो, अनपढ़ हूँ पर तुमसे ज्यादा जानती हूँ । इससे अच्छा होता कि हम गाँव में ही कोई काम धंधा ढूँढ लेते कम खाते गम खाते पर खुश तो रहते।"

मानो भोलू के मन की बात उसने कह डाली हो , वह शहरी जिंदगी शोषित मजदूरी से तंग आ चुका था खाना खत्म करते हुये वह बोला 'तो क्या कहती हो 'चलें गाँव की ओर'.

(पंकज जोशी)सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ ।उ०प्र०
०७/०५/२०१७

Sunday, 30 April 2017

इसी ग्रह का प्राणी

"भाईसाहब, आपको तो खबर मिल ही गई होगी? विवेक ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही संजीव से पूछा।
 "कैसी खबर भाई?"
 "लो, इसका मतलब आप आस्था गए ही नहीं अभी तक?"

"यह आस्था क्या है?" मन ही मन मैं बुदबुदाया, अगर पूछुँगा तो यह सब कमीने मेरी खिल्ली उड़ाएँगे। अपनी भद पिटवाने से अच्छा है चुप बैठूँ!

"अच्छा वहाँ, हाँ भई, अभी नहीं गया, जाना है,साथ चलेंगें.... क्या कहते हो?" उसने प्रत्युत्तर दिया।

मैं सोच में पड़ गया कि थियेटर में कोई नयी पिक्चर आई है या कहीं कोई सेल लगी है? 

तभी बगल में बैठी रीना जी मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोली "वहाँ जाकर भी कोई वापस आया है भला कभी?"

मतलब, यह लोग किसी हस्पताल की बात कर रहे हैं! मैं निरामूर्ख शहर में रहते हुए ठीक तरह से हॉस्पिटल के नाम भी नहीं जानता, शायद नया खुला होगा। मैंने अपने आपको समझाते हुए कहा।

तभी मैडम की आवाज कानों में पड़ते ही मेरी तन्द्रा मानो भंग हुई "अरे, कोई इलाज-विलाज नहीं होता है वहाँ, अगर कभी दर्द होता है तो पेनकिलर दे देते हैं। भाईसाहब, बड़े साहब की तनख्वाह कितनी होगी? डेढ़, दो-लाख रुपये तो महीने की होगी ही!"

"आप भी, अरे, इतनी तो कट के उनके हाथ में आती है!" एक सहकर्मी तपाक से बोला।

"लो, और सुनो, मैडम भी तो क्लास वन अधिकारी हैं, इनसे कम तो वह भी नहीं कमाती होंगी, फिर साहब ने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में क्यों रखा है? इससे अच्छा तो अपना पानी पिलाने वाला है जो अपने माँ बाप की सेवा घर पर ही कर रहा है!" 

अच्छा तो यह माजरा है सब समझते  हुए मैं कुर्सी के अंदर धँसने लगा। 
"क्या मैं इसी ग्रह का प्राणी हूँ?"

पंकज जोशी
लखनऊ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
३०/०४/२०१७

Thursday, 20 April 2017

मात

" साला, हरामखोर ", वह बुदबुदाया  , कौन किसकी बातें कर रहे हो ? पत्नी ने झेंपते हुए चारों ओर अपनी नजरें घुमाते हुए पति से पूछा ।

"अरे और कौन वही - सामने देख उसको , नीली शर्ट ,घुँघराले बाल वाले को - कभी दो वक्त की रोटी के लिये तरसता था आज बैठा है इस महंगे होटल में........."

'हूँ, सुड़प सुड़प चम्मच से सूप पीती हुई अनजान बनते हुए बोली तुम भी क्या , कभी भी कहीं भी शुरू हो जाते हो.......

क्या कभी भी कहीं भी-एक नम्बर का घूसखोर ,  लुच्चा, घटिया इंसान है वो, मक्कारी उसकी रगो में कूट कूट कर भरी हुई है - तुम इतना कुछ उसके बारे   कैसे जानते हो ? " पत्नी ने तुरन्त प्रश्नवाचक चिन्ह उसकी ओर दागा ।

"क्यों ना जानूँगा उसके बारें में मैं , मेरा जूनियर था वो कभी , धंधे की एक एक बारीकियाँ सिखाईं  हैं मैंने उसे ......'

सुड़प सुड़प सूप को पीते हुये वह उससे चुहल के अंदाज में बोली " ऐसा क्यों नहीं कहते कि बाप नम्बरी तो बेटा दस नम्बरी " 

पत्नी के मुँह से ऐसा अप्रत्याशित कथन उसकी कल्पना के परे था , चेहरा गुस्से से लाल हो उठा , अपने थोड़ा सयंमित करते हुये बोला "चलो चलते हैं यहाँ से " कहते हुये उसने अपना पर्स खोला और कुछ हरी पत्तियां मेज पर बिखेर दी ।

जीत के भाव रानी के चेहरे पर साफ़ परिलक्षित थे उसने तुरंत अपनी सीट छोड़ी और रेस्त्रां के बाहर आ खड़ी हुई राजा को आज उसी के खेल में दी पटखनी से उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो चुके थे ।

(पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ । उ०प्र०
२०/०४/२०१७

Saturday, 15 April 2017

सीख

" मम्मी देखो एक्वेरियम से मछली उछल कर बाहर आ गई है , इसे अंदर डालो नहीं तो यह मर जायेगी।"
पद्म ने अपनी मां का आँचल खींचते हुए कहा ।"बेटा यह मछली अब बड़ी हो गई है और एक्वेरियम इसके लिये छोटा वैसे भी अब यह किसी काम की नही रही...यह बच्चे को तुम क्या उल्टी सीख दे रही हो रीमा ? प्रशांत ने अखबार को मेज पर रखते हुए कहा और क्या सही तो कह रही हूँ बाबू जी मैंने क्या कुछ गलत कहा , आप ही बताइए ?" रीमा ने अपने ससुर की ओर देखते हुये कहा ।
आज उन्हें स्वयं का फ्लैट छोटा प्रतीत हो रहा था वह मौन अपने चश्मे का शीशा साफ़ करने में लगे ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१५/०४/२०१७

Tuesday, 3 January 2017

लालच

कंपनी बोर्ड की मीटिंग चल रही थी जिसको एम डी साहब चेयर कर रहे थे और सबके सम्मुख विभोर जो कंपनी का जनरल मैनेजर है मीटिंग का एजेंडा पढ़ रहा था । 

तभी एम डी साहब के मोबाईल पर  व्हाट्स एप्प वीडियो फ़्लैश हुआ । 

" अरे  जी ०एम्० साहब कब तक एजेंडा सुनाते हुए इन लोंगो को बोर करेंगे । आइये हम सब थोडा मनोरंजन कर लें । " 

" पर सर  कंपनी के लिए एजेंडा इम्पोर्टेन्ट है "  विभोर ने उन्हें टोकते हुए कहा ।

" जो मैं दिखाने जा रहा हूँ वह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं , उसको देखने के बाद आपकी जिंदगी भी बदल जानी है । पर उससे पहले मैं आप लोंगो से पहले कुछ पूछना चाहता हूँ - यह कंपनी आप लोंगों के लिये क्या मायने रखती है ? " 

अचानक कमरे में सन्नाटा पसर गया । 

" अरे आप सब तो अनुभवी लोग है अच्छा विभोर जी आप ही बताइये ? "

विभोर अपनी सीट से उठा और                  आत्मविश्वाश से बोला 

" सर कंपनी हमारी माँ है । " 

" क्यों  और कैसे ? " बॉस ने पूछा । 

" सर यह हमें रोजी-रोटी देती है । " कहते हुए वह अपनी सीट में वापस जा बैठा । 

" गुड मुझे आपसे ऐसी उम्मीद थी । "  एम डी साहब बोले । 

और अपने फोन को  प्रोजेक्टर से अटैच कर वीडियो दिखाने को कहा । 

" चलिये आज हम सब रोजी से मिलते हैं । 

प्रसन्न मुद्रा में विभोर ने प्रोजेक्टर को ऑन किया ।

होटल के कमरे में विभोर ने एक लिफाफा अपनी जेब से निकाला लड़की ने देखा उसकी फोटो खींची और पर्स से एक रूपये की गड्डी लिफ़ाफ़े के साथ उसके हाथ में रख दी । जैसे ही लड़की मोबाइल अपने पर्स में रखने वाली थी तभी उसने लड़की जैकेट की चेन की ओर हाथ बढ़ाया जिसे लड़की ने बीच में ही रोक दिया टेंडर की कॉपी के लिए पैसे आपको दे दिये गये है । इससे आगे बढ़ना चाहते हैं तो कंपनी के नये प्लांट का ब्लूप्रिंट दिखा दीजिये । साहब ना आप कही जा रहें हैं ना मैं । 

वीडियो समाप्त हो गया । विभोर सिर से पाँव तक पसीने से भीगा हुआ था । हाथ काँप रहे थे ।

" सर मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई " कहते हुए जैसे ही वह उनके क़दमों पर गिरना चाहा ...........

तभी बॉस की चीख ने हाल में पसरे सन्नाटे को तोड़ दिया ।

" हरामखोर अपनी ही माँ के साथ बलात्कार करता है । जिस थाली में खाता है उसी में छेद " कहते हुए उसने इंटरकॉम का बटन प्रेस किया - " प्लीज सैंड द सिक्योरिटी एंड द लेडी इन " 

अगले पल बॉस ने वीडियो वाली लेडी का परिचय अपने मैनेजमेंट से करवाया । 

मीट योर न्यू जी० एम० मिस रोजिटा


(पंकज जोशी)सर्वाधिकार सुरक्षित
मौलिक व अप्रकाशित 
०३/०१/२०१७
लखनऊ । उ०प्र०

काली

" बहू जी यह लो अपनी दूध की बाल्टी कल से दूध नहीं आयेगा मरद बोला है मेरा "  

सन्ध्या काली की बात सुन कर आश्चर्य में पड़ गई । " अरे ऐसे कैसे अचानक से दूध लाना बंद कर दोगी ? वह अपनी बात पूरी करती तभी काली तपाक से बोली वह बोला कि अगर बहू जी पूछें तो उनसे कह देना कि चारा मिलने में दिक्कत आ रही है अब शहर जा कर कोई काम ढूढेंगे । 

अरे यह भी कोई बात हुई सन्ध्या बड़बड़ाने लगी । कोई अपना बंधा हुआ काम छोड़ता है भला अरे तो फिर गाय को क्या करोगे कुछ नहीं वह बोला इसको कसाई को बेच देंगे ।

अच्छा जैसी तुम्हारी मर्जी यह लो तुम अपना आजतक का हिसाब उसने उसे पैसे देते हुए कहा पर छुट्टे नहीं बहु जी कोई बात नहीं तू रख इसे । वैसे भी दूध मैंने तेरे बच्चे के पेट भरने के लिये लगाया था वरना मैं अकेली जान इतना दूध थोड़े ही पीती हूँ । "

काली ने नोट अपने ब्लाउज में खोंसा और घर की ओर चल दी यह सोचते हुए बीबी जी के दूध खरीदने से उसके बच्चे का पेट कैसे भरेगा ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
०३/०१/२०१७
लखनऊ । उ०प्र०
मौलिक व अप्रकाशित

ढहते किले

शहर की कॉस्मोपोलिटन ज़िन्दगी देखने की चाह व बेटी से मिलने की तड़प उनको यहाँ खींच लाई थी ।

" बेटे जी अह्ह्ह ! जी पपा मैं इधर हूँ ड्राइंग रूम में , रामलाल जी जो अभी अभी मॉर्निंग वॉक ले कर आये थे गले को ठीक करने लगे , 

जब से मैं आपके घर आया हूँ देख रहा हूँ आप लोंगो कुछ ज्यादा ही बिजी हैं । सुधीर कब आता है कब चला आता है पता ही नहीं चलता । 

बच्चे स्कूल गये ? जी , पपा जी ।
बिना देखते हुए उसने प्रत्युत्तर दिया ।

पप्पा आज सुनिधि के वहाँ किट्टी पार्टी है तो दिन का मेरा खाना तो उसके घर है आपके लिये क्या बना दूँ , एक पत्ते के ऊपर दूसरे पत्ते को टिकाते हुए वह बोली ।

कुछ भी जिसमें आपको सुविधा हो । ठीक है मैं मालती को बोल दूँगी वह आपकी मन पसंद खिचड़ी बना देगी ।

ठीक है जैसा आप उचित समझे पर यह सुबह सुबह आप क्या लेकर बैठ गईं ?

पपा जी ताश का घर बनाने की कोशिश कर रहीं हूँ  ,  इससे दिमाग फोकस होता है , पर बेटा यह सब दिन में , जब व्यक्ति फुर्सत में हो तब यह सब चलता है यह सही वक्त नहीं है । 

तभी वह उसे चिड़ाने के लिये हल्की सी हवा में फूँक मारता है । ताश की मंजिले एक एक करके जमीं दोज हो गईं ठीक वैसे ही जैसे बचपन में कोई तेज लहर उसके रेत के घर को अपने साथ बहा ले जाती थीं । 

पप्पा यह क्या किया आपने फिर मेरा घर ढहा दिया । बेटी के सिर में हाथ फेरते हुए बोले बेटे जी मैंने कुछ कहाँ किया उसकी बुनियाद ही कमजोर होगी । 

मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे " अगर नकली घर ढहाने से असली घर बचता है तो ऐसा ही सही ।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित
०३/०१/२०१७
लखनऊ । उ०प्र०

Tuesday, 13 September 2016

प्रकृति

"अहा , कितना सुंदर दृश्य है चांदनी रात में कैसी मनोरम छटा छाई हुई है । ओह तुम आ गये ? वह बोली 
"कैसे ना आता आधी रात बीतने को आई है लगता है घर के सभी लोग सो गये हैं तुम क्यों नहीं सोई अभी तक कैसे सो सकती थी बिना तुम्हें कुछ खिलाये हुए तुमने भी अभी कुछ नहीं खाया होगा चलो साथ खाते हैं।उसने जोर देते हुए कहा।
प्रकृति ने जैसे ही उठने के लिये अपने सिर पर घूंघट काढ़ने के लिये मुख उठाया ,

 "अप्रतिम! हो तुम । हा आज इस चांदनी रात में तुम चाँद से भी अधिक सुंदर लग रही । इतने वर्ष हो गये हमारे विवाह के पर घर गृहस्थी , ज़िन्दगी की भाग दौड़ ने कभी अवसर ही नहीं मिला एक पल साथ में गुजारने का।"

कहते हुए पुरुष ने प्रकृति को अपने अंको में समेट लिया । चुम्बनों के बीच बहते अश्रुओ की धारा ने पुरुष के पाषाण हृदय में प्रेम के सुवासित फूल खिला दिये थे ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

Wednesday, 25 May 2016

प्यासा कुआँ

कैलाश में भगवान शिव ध्यानस्थ अवस्था में लीन थे । तभी नारद जी वहाँ पहुंचे " नारायण नारायण , हे ! प्रभु पृथ्वी लोक में  जनता परेशान व दुःखी है सर्वत्र लोग त्राहिमाम त्राहिमाम पुकार रहे हैं कुछ तो अपने भक्तों के कष्टों का निराकरण करें ।"

नारद की आवाज सुन शिव अपनी समाधिस्थ अवस्था से बाहर निकले और बोले , हे ! नारद मैंने तो प्रकृति को मानव के रहने के अनुकूल ही बनाया था पर मनुष्य ने अपने बढ़ते लालच के कारण भू माता का ही दोहन करना शुरू कर दिया । देखो ना पृथ्वी में चहुँ ओर जंगलो में आग ही आग लगी है नदियाँ सूखने लगी है । जंगल समाप्त हो चुके है , कृषक भूमि समाप्त हो चुकी है उसकी जगह बड़े बड़े शॉपिंग माल ने ले ली है जनगण सभी दाने - पानी को मोहताज हो चुके है । देखो नारद भू लोक में कैसे कुयें के चारों ओर मारकाट मची हुई है । लोग बूँद बूँद पानी के लिये कैसे अपनो के खून के प्यासे हो अपनों के ही रक्त से सूखें  कुँए की प्यास बुझा रहे हैं । " 

"नारायण नारायण प्रभु आप ही सृजक और आप ही संहारक हैं । मैं पालन कर्ता विष्णु लोक को चला नारायण नारायण।"


(पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित 
मौलिक व अप्रकाशित ।
26/06/2016

प्यासा कुआँ 1

कैलाश में भगवान शिव ध्यानस्थ अवस्था में लीन थे । तभी नारद जी वहाँ पहुंचे " नारायण नारायण , हे ! प्रभु पृथ्वी लोक में  जनता परेशान व दुःखी है सर्वत्र लोग त्राहिमाम त्राहिमाम पुकार रहे हैं कुछ तो अपने भक्तों के कष्टों का निराकरण करें ।"

नारद की आवाज सुन शिव अपनी समाधिस्थ अवस्था से बाहर निकले और बोले ," हे ! नारद मैंने तो प्रकृति को मानव के रहने के अनुकूल ही बनाया था पर मनुष्य ने अपने बढ़ते लालच के कारण भू माता का ही दोहन करना शुरू कर दिया । देखो ना पृथ्वी में चहुँ ओर जंगलो में आग ही आग लगी है नदियाँ सूखने लगी है । जंगल समाप्त हो चुके है , कृषक भूमि समाप्त हो चुकी है उसकी जगह बड़े बड़े शॉपिंग माल ने ले ली है जनगण सभी दाने - पानी को मोहताज हो चुके है । देखो नारद भू लोक में कैसे कुयें के चारों ओर मारकाट मची हुई है । लोग बूँद बूँद पानी के लिये कैसे अपनो के खून के प्यासे हो अपनों के ही रक्त से सूखें  कुँए की प्यास बुझा रहे हैं । "

नारायण नारायण प्रभु नारद जी ने की  ही आवाज जैसे ही मेरे कानों में पड़ी ।

 तुरन्त मैं नींद से हड़बड़ा कर उठा और संकल्प लिया की आज से हर व्यक्ति को जंगल बचाओ पर्यावरण बचाओ के लिये प्रेरित करूँगा ।

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
मौलिक व अप्रकाशित ।
26/06/16

Monday, 2 May 2016

लाल सलाम -एडिटेड

"अरे रवि बहुत दिनों बाद दिखे हो ? कहीं बाहर गये थे क्या?"
कैम्पस में काफी समय बाद मिली बचपन की दोस्त आयशा ने उससे पूछा ।
"बस यूं ही घर चला गया था।"
"बड़ी अजीब बात है, कल ही मैंने घर फोन किया था तो पता चला कि तुम कई महीनो से घर गये ही नहीं।"
"अच्छा मेरी अम्मा, तुम अभी चलो मुझे क्लास अटेंड करनी है और भी काफी काम है।"
"वैसे यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने ? लम्बे बाल, दाढ़ी, फ़टी जीन्स, यह चप्पल और कंधे पर झोला।" 
"वो.. बस यूँ हीं ......."
"कैम्पस में लोग ना जाने तुम्हारे बारे में बातें कर रहे हैं , तुम्हे पता भी है?"
"क्या कहते हैं मेरे बारे में?"
"यही कि तुम किसी संगठन से जुड़ें हो।"
"तो क्या मैंने कोई अपराध कर लिया ?"
"देखो मैं तुम्हें कुछ समझाने का प्रयत्न कर रही हूँ कि ...."
इससे पहले की वह कुछ कहती तभी उसने उसे रोक दिया 
"देखो तुम मेरी पैरेंट बनने की कोशिश ना करो। और तुम्हें यह अधिकार दिया किसने कि तुम मेरी इंकायवरी करती फिरो?"
"क्या यह भी बताना होगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ ? चलो बैठो कार में, पहले मैं तुम्हारा हुलिया बदलवा दूं फिर किसी अच्छे से रेस्त्रां में बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे।"
"तुम पूंजीवादियों की यही समस्या है कि हर समय अपने पैसे की धौंस जमाते रहते हो।"
"हैलो ! यह क्या बोल रहे हो हमारे बीच यह सब कहाँ से ? ..... " 
तभी पीछे से आती हुई भीड़ के नारों में उसकी आवाज दब गई और रवि ने तेजी से अपना हाथ आयशा से छुड़ाया और इंक़लाब ज़िंदाबाद-पूंजीवाद मुर्दाबाद  चिल्लाता हुए उसमे खो गया ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

लालच

कंपनी बोर्ड की मीटिंग चल रही थी, जनरल मैनेजर विभोर मीटिंग का एजेंडा पढ़ रहा था । तभी एम डी साहब के मोबाईल पर वीडियो फ़्लैश हुआ और वे विभोर से बोले

"अरे जी०एम्० साहब! कब तक यह एजेंडा सुनाकर इन लोंगो को बोर करेंगे। आइये हम सब थोडा मनोरंजन कर लें।"
"पर सर कंपनी के लिए एजेंडा इम्पोर्टेन्ट हैI" विभोर ने उन्हें टोकते हुए कहा ।

"लेकिन मिस्टर विभोर, जो मैं दिखाने जा रहा हूँ वह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं I जिसे देखने के बाद शायद आपकी जिंदगी ही बदल जाए। पर उससे पहले मैं आप लोंगो से पहले कुछ पूछना चाहता हूँ कि यह कंपनी आप सबके लिए क्या मायने रखती है ?"

अचानक कमरे में सन्नाटा पसर गया ।
"अरे आप सब खामोश क्यों हैं? अच्छा तो विभोर जी आप ही बताइयेI"

विभोर अपनी सीट से उठा और आत्मविश्वाश से बोला:
"सर कंपनी हमारी माँ है । "
"क्यों और कैसे?" बॉस ने पूछा ।
"सर यह हमें रोजी-रोटी देती है।" कहते हुए वह अपनी सीट में वापस जा बैठा ।

"वेरी गुड! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद थी।" एम डी साहब बोले ।

और अपने फोन को प्रोजेक्टर से अटैच कर वीडियो दिखाने को कहा ।

"चलिये आज हम सब अपनी रोज़ी रोटी से मिलते हैं ।"

प्रोजेक्टर ऑन हुआ, विडियो शुरू हुआ। उसमे विभोर एक सुन्दर महिला से बात रहा था: 
“ये लो मैडम उस टेंडर की कॉपी जो हमारी कम्पनी ने भरा है I”

“वाह विभोर जी, आपने अपना वादा निभायाI ये लीजिए आपका इनामI” नोटों से भरा लिफाफा पकड़ाते हुए उसने कहा ।


“ओह थैंक्यू डिअर...” कह कर उस लड़की की कमर में हाथ डालने लगा, जिसे लड़की ने बीच में ही रोक दिया ।


“इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं विभोर जी, हम कहीं भागे थोड़े ही न जा रहे हैंI टेंडर की कॉपी के लिए पैसे आपको दे दिये गये है। अब इससे आगे बढ़ना चाहते हैं तो कंपनी के नए प्लांट का ब्लूप्रिंट दिखा दीजिये।“


वीडियो समाप्त हो गया। विभोर सिर से पाँव तक पसीने से भीगा हुआ था, उसके हाथ पाँव काँप रहे थे।

"सर! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गईI" कहते हुए जैसे ही वह उनके क़दमों पर गिरना चाहा .....

तभी बॉस की कड़कती हुई आवाज़ ने हाल में पसरे सन्नाटे को तोड़ दिया ।


"हरामखोर! जिस कम्पनी को माँ बताता है, उसी के साथ बलात्कार ? जिस थाली में खाता है उसी में छेद?" कहते हुए उसने इंटरकॉम का बटन प्रेस किया ?

"सिक्योरिटी, मैडम को अन्दर भेजो । "


अगले पल एमडी ने वीडियो वाली लड़की का परिचय अपने मैनेजमेंट से करवाया: इनसे मिलो ये हैं हमारी नई जनरल मेनेजर मिस रोजिटा ।”

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०
29/04/2016

Wednesday, 16 March 2016

दर्द

हस्पताल में अपने बेटे के पास बैठा ही था तभी अचानक चौधरी का फोन खनखनाया । मंत्री का फोन था सो उसे उठाना पड़ा । " जी मंत्री जी , क्यों बे ! चौधरी आज का अखबार देखा क्या ? नहीं साहब क्यों हुआ ? चौधरी बोला उधर से मंत्री ने उत्तर दिया क्या सारा माल अकेले हजम कर जायेगा कैसा घटिया मसाला लगाया कि पुल उद्घाटन से पहले ही गिर गया दो मजदूर परिवार पिस गये । साहब कट तो आपको भी गया था  " कहते हुये उसने अपना सिर
पकड़ लिया ।

" पापा मुझे क्या हुआ , मुझे कमजोरी हो रही है ? " बेटा तुझे कुछ नहीं हुआ बस एक दो दिन की बात है फिर डिस्चार्ज कराके घर चलेंगे। रोहित के पिता ने कहा ।
तभी उसकी तबियत अचानक बिगड़ गई " पापा मुझे छोड़ कर मत जाना मेरी आँखों  के सामने अँधेरा छा रहा है । तू रुक अभी मैं डॉक्टर को बुला कर लाता हूँ । "

" डॉक्टर साहब मेरे बच्चे को बचा लीजिये जितना रुपया चाहिए मैं आपकी झोली भर दूंगा यह लीजिये यह सोने का हार  दो तोले का है । "

" कैसी बातें कर रहे हैं चौधरी साहब उसको लुकिमिया है । आखरी स्टेज है बचना मुश्किल है ।

" पैसे से आप किसी की जिंदगी नहीं खरीद सकते डॉक्टर ने उसे समझाते हुए कहा ।"

चेहरे पर निराशा , हताशा के भाव लिये वह लड़खड़ाते क़दमों के साथ रोहित के बेड के पास पहुंचा । बुदबुदाते हुए हे ! " भगवान मेरे पापों का फल मेरे बच्चे को मत दो । "

पापा पापा कहते हुये रोहित ने उसकी गोद में आखरी सांस ली ।

श्मशान घाट पर चौधरी को अपनी दौलत धू धू करते हुये जलती नजर आ रही थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
16/03/2016
मौलिक व अप्रकाशित
लखनऊ । उ०प्र०

Friday, 11 March 2016

सेंट्रल पार्क

पत्नी के देहांत के पश्चात रवि अपने बेटे के पास अमरीका आकर बस गया था ।अपने पालतू कुत्ते शेडो के साथ घण्टो सेंट्रल पार्क में हाथ में वाइन की बोतल और कैमल सिगरेट पैक से श्वेत दण्डिका निकाल कर सुलगाना यह उसकी दिन चर्या का एक हिस्सा बन चुका था । ऐसे ही उसकी नजर पड़ोस की बैंच पर पड़ी एक प्रौढा युवती पर पड़ी । बोरियत से बचने के लिये उसने उससे दोस्ती गांठने की ठानी ।

" हैलो आई एम् रवि...." जैसे ही उसके यह शब्द जुबां से बाहर निकल पाते तभी वह चिल्लाया " अरे ऋचा तुम ?  पहचाना मुझे मैं रवि उसने अपना परिचय देते हुए कहा "

 " हाँ पहचान लिया कैसे भूल सकती हूँ तुम्हे । " ऋचा बोली

" सिगरेट बुझाते हुए उसने पूछा तुम यहाँ कैसे और कब आईं ? " 
" अरे मेरी लड़की रहती है यहां तो साथ कुछ वक़्त गुजारने चली आती हूँ भारत से " और तुम यहाँ कैसे प्रश्न के साथ ही ऋचा ने कुछ खिसकते हुए बैंच पर उसे बैठने को इशारे से कहा । 
" खांसते हुए उसने एक आह भरी और बोला भला चंगा तुम्हारे सामने हूँ । बेटा मेरा यही बस गया है तो वहां सब कुछ बेच कर .... कहते हुए फिर से खांसने लगा । 

"क्यों पीते हो इतनी जब तुम्हें सूट नहीं करती है । ठण्डी हवा चल रही है , मफलर क्यों नहीं डालते हो गले में " ऋचा ने ठिठोली करते हुए कहा ।

पल भर में उसने ऋचा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा । " तुम आज भी मेरा कितना ख्याल रखती हो काश तुम मायके में रहने की जिद ना करती तो आज हम दोनो एक साथ रहते होते । "

"आह काश तुमने मेरे पापा की बात मान ली होती , मैं उनकी इकलौती बेटी थी शानो शौकत से भरी हमारी जवानी गुजरती और बुढापा भी ।" ऋचा ने तंज कसते हुए कहा ।

" तुम आज तक नहीं बदली वही अंदाज जिद्दी , वही अल्लहड़पन " रवि ने हंसते हुये कहा ।

" तुम भी कहाँ बदले हो आज भी मेरा कहना नहीं मानते हो । शाम होने को आई है पर मॉफलर नहीं ओढ़ा तो नहीं ओढ़ा " नहले पे दहला मारते हुए बोली ।

" हाँ चलो चलते हैं शाम होने को आई है , सुनो कल तुम जरा जल्दी आ जाना , जब तक यहाँ हो , तुम्हारा साथ मुझे अच्छा लगता है " रवि ने उसकी ओर मुखातिब होते हुए अपने जवानी के दिनों को याद करते हुये कहा जब दोनों एक साथ पार्क की बैंच पर हाथों में हाथ डाले घण्टो बैठा करते थे ।

" रवि एक बात कहूँ " हाँ हाँ कहो क्या कहना चाहती हो ? बस यही कि क्या हम फिर से एक नहीं हो सकते हैं मेरा मतलब शादी से है । " ऋचा ने मानो जल्दी से अपनी बात कहना चाहा हो ।

" तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है उसने उसके हाथों को प्यार से सहलाते हुए कहा , बुढापे में सठिया गई हो , अब हमारे पोते पोतियों की शादी होने वाली हैं  " 
उसके यह कहते ही हवा में अजीब सा सन्नाटा पसर गया ,
 दोनों की आँखों से बहते हुए आंसुओ के कारण धुंध सी छा गई । दोनों ने अपने अपने चश्मों को पोछते हुए एक स्वर में बोले कल फिर मिलेंगे कहते हुए विपरीत दिशाओं में अपने अपने गंतव्यों की ओर चल दिये ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र
11/03/2016

Sunday, 28 February 2016

लाल सलाम

" अरे रवि बहुत दिनों बाद दिखे हो ? कहीं बाहर गये थे क्या  ? " कैम्पस में काफी समय बाद मिली उसके बचपन की दोस्त आयशा ने उससे पूछा ।
" अरे कुछ नहीं बस यूं ही घर चला गया था । बड़ी अजीब बात है कल ही मैंने घर फोन किया था तो पता चला कि तुम कई महीनो से घर  गये ही नहीं । अच्छा मेरी अम्मा तुम अभी चलो मुझे क्लास अटेंड करनी है और भी काफी काम है । "
कैंटीन से अपनी किताबें उठाते हुए चलने को हुआ " और यह साथ में तुम्हारे लड़की कौन है ? परिचय नहीं करवाओगे मेरा इससे ? अरे यह तान्या है मेरी क्लास मेट और तान्या यह है आयशा ,खुश चलो चलते हैं । यह तुम बेगानो जैसा क्या सलूक कर रहे हो मेरे साथ , मैं कई दिनों से देख रही हूँ तुम मुझसे कन्नी काट रहे हो , ठीक से बात भी नहीं करते ,यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने ? लम्बे बाल , दाढ़ी , फ़टी जीन्स , कुर्ता , यह चप्पल कंधे पर झोला मुँह से कैसी अजीब सी बदबू आ रही है ?  

कैम्पस में लोग ना जाने तुम्हारे बारे में बातें कर रहे हैं , तुम्हे पता भी है ? क्या कहते हैं मेरे बारे में ? रवि ने प्रश्न किया ? यही कि तुम किसी संगठन से जुड़ें हो । तो क्या मैंने कोई अपराध कर लिया ।
देखो मैं तुम्हें कुछ समझाने का प्रयत्न कर रही हूँ कि ....इससे पहले की वह कुछ कहती तभी उसने उसे रोक दिया " देखो मैं अपना भला बुरा भली भांति समझता हूँ , तुम मेरी पैरेंट बनने की कोशिश ना करो । और तुम्हें यह अधिकार दिया किसने कि तुम मेरी इंकायवरी करती फिरो ?

क्या यह भी तुम्हे मुझे बताना होगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ ? चलो बैठो कार में पहले मैं तुम्हारा हुलिया बदलवा दूं फिर किसी अच्छे से रेस्त्रां में बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे । 
तुम पूंजीवादियों की यही समस्या है कि हर समय बात बात पर अपने पैसे की धौंस जमाते रहते हो ।

हैलो ! यह क्या बोल रहे हो हमारे बीच यह सब कहाँ से ? ..... " तभी 
पीछे से आती हुई भीड़ के नारों में उसकी आवाज दब गई और रवि ने तेजी से अपना हाथ आयशा से छुड़ाया और लाल सलाम , लाल सलाम चिल्लाते हुए उसमे खो गया । 

पीछे रह गई तो आँसूओं से डबडबाई उसकी आँखे जिसको अब भी विश्वाश नहीं हो रहा था कि उसके बचपन का प्यार उससे इतनी दूर चला जायेगा । 
( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित।
लखनऊ । उ०प्र०
27/02/2016
मौलिक व अप्रकाशित ।