Friday, 11 August 2017

नई पौध

'देखो ना! मनीष की अम्मा, यह पेड़ भी सूख गया खच खच खच जमीन पर खुरपी घिसते हुए उसने सड़े पेड़ को बाहर फेंकते हुए कहा।

'अरे पौधों को खाद-पानी के अलावा प्यार दुलार की भी आवश्यकता है ,यह काम रोज का है और तुम हो जब मर्जी की तो खुरपी पकड़ ली कभी पानी दिया तो दिया नही तो भगवान भरोसे।' तंज कसते हुए पत्नी बोली

मैं क्या कह रहा था कि अपनी हालत भी इन पेड़ों की तरह हो गई है- जवान बच्चे विदेशो में बस गये हैं अच्छा कमाते हैं कभी कभार फोन में हालचाल ले लेते हैं खर्च भी भेज देते हैं पर इन सबके अलावा भी तो ......कहते कहते वह रुक गया..... 

'अरे लो तुम तो अपने बच्चों को कोसने लगे' याद करो वह दिन जब बाबू जी के ईलाज के लिये हमारे पास पैसे नहीं होते थे अपने जेवर गिरवी रखे थे मैंने , तुम्हारे छोटे भाई बहनो की पढ़ाई .....उनकी शादी ......संयुक्त परिवार था हमारा। लेकिन तुम्हारे भाई-बहन तो पूछते तक नहीं हमें एक ही शहर में तो रहते हैं हम' कहते हुए उसकी आँखों में आंसू भर आये ...

'अरे तुम भी कहाँ की बात लेकर बैठ गई अपने मिश्रा जी को देखो कितने भाग्यशाली हैं , छींके नही कि बच्चे दवाई लेकर दौड़ पड़ते हैं'
'-खुरपी को साफ करते हुए वह बोला

'निक्कमें हैं अपने बाप की पेंशन तोड़ रहे हैं' झुंझलाते हुए बोली

'चलो बहुत हुई बागवानी-पंखी उड़ाते हुए बोली अंदर चलो तुम्हारा शरीर कांप रहा है तुम्हारे लिये कॉफी बनाती हूँ' उसने हूँ कहते हुए गर्दन हिलाई और दोनों वृद्ध एक दूसरे को कंधे का सहारा लेते हुए घर के अंदर प्रवेश करने लगे।

(मौलिक व अप्रकाशित)सर्वाधिकार सुरक्षित।
पंकज जोशी
१०/०८/२०१७

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