Monday, 2 May 2016

लाल सलाम -एडिटेड

"अरे रवि बहुत दिनों बाद दिखे हो ? कहीं बाहर गये थे क्या?"
कैम्पस में काफी समय बाद मिली बचपन की दोस्त आयशा ने उससे पूछा ।
"बस यूं ही घर चला गया था।"
"बड़ी अजीब बात है, कल ही मैंने घर फोन किया था तो पता चला कि तुम कई महीनो से घर गये ही नहीं।"
"अच्छा मेरी अम्मा, तुम अभी चलो मुझे क्लास अटेंड करनी है और भी काफी काम है।"
"वैसे यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने ? लम्बे बाल, दाढ़ी, फ़टी जीन्स, यह चप्पल और कंधे पर झोला।" 
"वो.. बस यूँ हीं ......."
"कैम्पस में लोग ना जाने तुम्हारे बारे में बातें कर रहे हैं , तुम्हे पता भी है?"
"क्या कहते हैं मेरे बारे में?"
"यही कि तुम किसी संगठन से जुड़ें हो।"
"तो क्या मैंने कोई अपराध कर लिया ?"
"देखो मैं तुम्हें कुछ समझाने का प्रयत्न कर रही हूँ कि ...."
इससे पहले की वह कुछ कहती तभी उसने उसे रोक दिया 
"देखो तुम मेरी पैरेंट बनने की कोशिश ना करो। और तुम्हें यह अधिकार दिया किसने कि तुम मेरी इंकायवरी करती फिरो?"
"क्या यह भी बताना होगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ ? चलो बैठो कार में, पहले मैं तुम्हारा हुलिया बदलवा दूं फिर किसी अच्छे से रेस्त्रां में बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे।"
"तुम पूंजीवादियों की यही समस्या है कि हर समय अपने पैसे की धौंस जमाते रहते हो।"
"हैलो ! यह क्या बोल रहे हो हमारे बीच यह सब कहाँ से ? ..... " 
तभी पीछे से आती हुई भीड़ के नारों में उसकी आवाज दब गई और रवि ने तेजी से अपना हाथ आयशा से छुड़ाया और इंक़लाब ज़िंदाबाद-पूंजीवाद मुर्दाबाद  चिल्लाता हुए उसमे खो गया ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

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