Wednesday, 6 January 2016

शिकायत का स्पर्श

एक विवाह समारोह में अचानक आकांक्षा की आँखें एक कोने में बैठे विनोद से जा टकराई । ब्लू डेनिम , सफेद शर्ट और ऊपर से हाफ स्लीव सफेद खादी कोट में वह खूब फब रहा था । पहले से कुछ ज्यादा मोटा हो गया था । दूर से खड़ी निहारते हुए उससे रहा नहीं गया उसने वेटर से कोल्ड ड्रिंक का गिलास हाथ में लिया और बढ़ गई उस ओर जहाँ वह बैठा था । " इतने अकेले क्यों बैठे हो विनोद ? तुम तो पार्टियों की जान हुआ करते थे ? आंकाक्षा ने फब्ती कसते हुए कहा । अरे तुम कब आईं , सॉरी ,  मैं कुछ सोच रहा था , तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया । " मैं भी तो जानू कि आखिर कौन है वह जिसकी याद में तुम खोये-खोये से रहने लगे हो । अरे तुम तो संजीदा हो गये मैं तो बस यूँ ही मजाक कर रही थी। तुम्हारे बीबी बच्चे किधर हैं वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं ।  उनसे मिलवाओगे नहीं ,  मैं इतनी बुरी भी तो नहीं दिखती आज भी .....। " मिलवाता तब जब मेरी शादी हुई होती ।" विनोद ने उत्तर दिया । तो क्या तुम अब तक कुँवारे हो ? " हाँ उसने प्रत्युत्तर दिया " , जवाब देते हुए उसके चेहरे पर स्मित रेखायें खिंच सी आई थी । " अरे तुम अपने परिवार वालों से कब मिलवाओगी ? " विनोद ने हंसते हुए पूछा । " अरे मैने भी अभी तक कहाँ की " अपने भाव-भँगिमा को छुपाते हुए बोली । " क्यों तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की ? देखने में सुंदर , बड़ी पढ़ी लिखी खुले विचारों की हो ऊपर से तुम अच्छा ख़ासा कमाती भी हो । तुम्हे तो कोई भी आई ए एस अधिकारी आसानी से  मिल जाता ।" " हाँ मिल तो जाता पर तुम्हारी तरह ना होता उसने गहरी श्वांस भरते हुए कहा। " " अगर तुम्हें मेरी परवाह होती तो मेरे उस खत का जवाब हाँ या ना में जरूर देती ,  मेरी तनख्वाह तुमसे जरूर कम थी पर प्यार नहीं । " विनोद ने उससे नजरे मिलाते हुए कहा ।"  तो क्या यही वजह  रही जो तुमने आज तक .... " पता नहीं शायद हाँ भी या ना भी उसने बेरुखी से गिलास को टेबल पर रखा और  वहां से चला गया । वह पीछे खड़ी उसको बुलाना चाह रही थी पर उसका गला रुंध सा गया था , उसके आँखों के कोरों से बहते आँसू इस बात का प्रतीक थे कि उसकी महत्वाकांक्षा के ऊपर विनोद का शिकायती तंज उसके ह्र्दयतल पर नश्तर सा स्पर्श कर गया था ।

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०६/०१/२०१६

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