Wednesday, 4 November 2015

अपराधी कौन

" श्याम तेरी आज रिहाई है । जैसा तू यहाँ अच्छा बन के रहा तू ऐसा ही बाहर भी  बन के रहना और देख अब कोई लफड़ा नहीं मांगता। " 

बाल सुधार गृह संचालक ने उसकी ओर मुखातिब हो कर कहा ।

आज तीन बरस बाद उसकी रिहाई थी । अपनी बहन को छेड़ने वाले लड़के को हॉकी से मार मार कर अधमरा कर मार डाला था । 

इतने दिनों तक वह ज़िंदा है कि मर गया परिवार जनों में से किसी ने भी उसकी सुध नहीं ली थी । आज उसे कोई लेने तक नहीं आया था । सीधा माँ-बाप से मिलने घर की ओर चल पड़ा ।

मोहल्ले में कदम रखते ही रहमान चाचा चिल्ला पड़े " अरे अपने अपने बच्चो को सम्भालना जरा हत्यारा जेल से छूट कर आ गया है कहीं कोई जरा सी बात हुई नहीं कि किसी का फिर से कत्ल पता चला हो जाय । " 

" चाचा यह क्या बोल रहे हो आप ? मैंने कोई जानबूझ कर मारा था उसे । अपनी बहन की रक्षा की थी उससे " अपना पक्ष रखते हुए बोला ।

" चुप ****** बदजात अपनी औकात में रह । हरामी कहीं का । चल फुट यहाँ से नहीं तो पुलिस के हत्थे चढ़वा दूंगा । "

आँखों से उसकी आंसू की एक धारा बह चली थी । घर पहुँच कर उसने कुण्डी खटका ही थी कि सामने उसने अपनी बहन को खड़ा पाया । " तुम यहां ? क्यों क्या हुआ ? " जब तक वह कुछ पूछता तब तक सीमा एक साँस में ही सब कुछ बोल गई । " तुम्हारी यहाँ कोई  जरूरत नहीं मेरी अगले हफ्ते शादी है और तुम्हारे जैसे हत्यारे की बहन होने से अच्छा है मैं बिना भाई के ही रहूँ। और मेरे ससुराल वाले भी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानते है । मैं अपने माँ बाप की इकलौती औलाद हूँ उन्हें बस इतना ही पता है । पर यह सब तो सीमा मैंने तुम्हारे लिए किया था । " 

उसने मेरा सिर्फ हाथ पकड़ा था कोई मेरा बलात्कार नहीं - जो तुमने उसे बेरहमी से मार डाला । अब आज के बाद मुझे अपनी शक्ल ना दिखाना । "

आज वह एक बार फिर  कोर्ट में जज के सामने खड़ा था लेकिन इस बार उसका सिर नीचा नही गर्व के साथ ऊँचा था । 

पंकज जोशी 
लखनऊ । उ०प्र०
०४/११/२०१५

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