Monday, 2 November 2015

व्यथा

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की !" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ?रामू कैसा है ? क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तुम्हारी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी है चाचा । " अब क्या बात क्या क्या अरमान संजोये थे बेटे की शादी को लेकर ऊपर से तेरी बहन के ससुराल वालों को उचित दहेज़ ना दे सका तो उसे पेट से है जानकार उसे यहां पटक गये । नासपीटी अपना घर छोड़ कर मेरी छाती में मूंग दल रही है। अब मैं अकेला इस  बुढ़ापे में घर बार चूल्हा चौक्का करूँ या खेतों में अनाज बोऊं । साहूकार ने जो रुपया उधार दिया था खेती के लिये पर बिन मौसम बरसात उसे ले डूबी । उसकी नजर मेरे खेत में हैं  मेरा जीवन तो जैसे अर्थहीन हो गया है । इस पार नदी तो उस पर खाई । अरे तुमको भी कहाँ लपेट लिया अपने चक्कर में कभी मौका मिले तो शहर में अपने भाई को जरा समझाना कि घर लौट आये । अच्छा अब मैं चलता हूँ। राम राम।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५

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