Tuesday, 3 November 2015

व्यथा -1

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की ! "

" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ? रामू कैसा है ? "

 "अब क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तेरी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । "

 " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी थी ना चाचा ? "  " हाँ बड़ी तो थी बेटा " । ओह फिर तो यह बहुत बुरा हुआ चाचा तुम्हारे परिवार के साथ । " 

" अरे कीड़े पड़े नासपीटी उस कलमुहीं के जो मेरे बुढापे का सहारा छीन मुझसे छीन लिया ।"

 " देखो चाचा यहां तुम गलत बात कर रहे हो अब इसमे उस बेचारी औरत का क्या दोष । अब तुम्हारा सुखिया कोई कम है , यह तो पूरा गांव जानता है उसके लक्षण के बारे में। दिन भर नशे में चूर और रात भर उसके घर में आने जाने वाले  लोंगो का ताँता लगता था । आखिर वह भी एक इंसान थी कोई पत्थर की मूरत नहीं उसको भी इस दलदल से छुटकारा चाहिए था । तो जरिया तेरा लड़का बना । अच्छा अब मैं चलता हूँ राम राम । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५

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