Saturday, 17 October 2015

अस्तित्व

" क्या बात है सुकन्या तुम्हारी आँखों में आँसू क्या तुम मेरे साथ गाँव में खुश नहीं हो ? " 
" नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस यह कमबख्त कब निकल आये पता ही नहीं चला । बीते दिनों  की याद चली आई । अब तो बरसों बीत गए इस बात को ।  मैं तुम्हारा अहसान कैसे भूल सकती हूँ रवि ! , अगर उस  रात तुम ना होते तो मैं समाज को क्या मुँह दिखाती ? "

" इसमें अहसान कैसा पगली तुम तो मुझे सैदेव ही पसन्द थी। लेकिन जो भूल मुझसे हुई रंगमंच की अदाकारा को घर में बाँधने की उसका प्रायश्चित मैं करके रहूँगा । हम कल ही शहर चलेंगे । तुम्हारे नाम पर पड़ी धूल की परत हटाने । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

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