Tuesday, 13 October 2015

अहं

" सुनो जी आज से अपने भैय्या से कह देना कि मुझसे रौब से खाना पीना मत माँगा करें ।  मेरी शादी तुम्हारे संग हुई है तुम्हारे घर वालों के साथ नहीं ! " 

 " पर उमा मैं यह कह सकता हूँ भाभी को गये अभी महीना भर नहीं हुआ है ऊपर से बिट्टू भी तो छोटा ही है क्यों  तुम बच्चे को स्वयं अपना लेती । "

" मैंने दुनिया जहाँ का ठेका नहीं ले रखा सोमेश कल मैं अपने माँ के घर चली जाऊँगी जब तुम्हारे भैय्या का इंतजाम हो जाये तो मुझे बुला लेना " 

पर ऐसी निष्ठुर तुम कैसी हो सकती हो तुम भी तो एक स्त्री हो । 

तभी उन्हें पीछे से बड़े भैय्या की आवाज सुनाई पड़ी - बहू ! तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं मैं कोई ना कोई इंतेजाम कर लूँगा भाग्य की मार के आगे तुम्हारे वचन फिर भी अच्छे हैं ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/10/2015

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