Sunday, 13 September 2015

वक़्त     
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दरवाजे पर घण्टी बजा कर जैसे ही  पार्सल वह अपने झोले से निकालने ही वाला था कि सामने उसने रेखा को खड़ा पाया । उसकी आँखों के सामने बीता कल घूम गया था । अरे यह तो वही पगली है जिसे सारे बच्चे पाठ शाला में चिढ़ाया करते थे ।

" आज यह सेठानी बन गई वाह री तकदीर ।

अनजान  बन चुपचाप उसने विदेश से आया पैकेट  निकाला , कागज में हस्ताक्षर करवा कर वह जैसे ही चलने को हुआ । उसके कानों को इक कोमल आवाज सुनाई पड़ी । " एक मिनट भैय्या जरा रुकिए तो सही मैं अभी आती हूँ !  सेठानी ने हाथ से उसे इशारा करते हुए कहा और अंदर चली गई "

थोड़ी देर में वह हाथ में  एक छोटा सा पैकेट लेकर आई " यह भाभी जी को दे  दीजेगा , और कहियेगा यह उनकी पगली ननद ने भेजा है । 

" आज उसे यह शहर पराया नहीं लग रहा था । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/09/2015

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