Thursday, 3 September 2015

उर्मिला की व्यथा 
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आज राज्य की सड़के सूनी हो पड़ी हैं , तीन सधवायें को अकारण ही वैधव्य को प्राप्त होना पड़ा , अनजाने में किया एक ऐसा प्रण जिसके फलस्वरूप पुत्र विछोह का दंश महाराज सहन ना कर  सके और प्राण त्याग दिये । प्रजा बिना राजा के अनाथ हो गई ।

पर महल के कोने में बैठी उस फूल सी कोमल स्त्री का क्या दोष ? जो उसको सधवा होते हुए भी श्रृंगार रहित हो , भगवा वस्त्र धारण करना पड़ा।

रानी से उसका कुम्हलाया चेहरा देखा ना गया वह उसको गले लगाते हुए बोली " यह तो विधि का विधान है जो टाला नहीं जा सकता "

कांधे में सिर रखी कन्या के सब्र का बाँध टूट चुका था " माँ ! यह कैसी वचनों को निभाने की कुल रीति है  जिसका वनवास मुझे अगले चौदह साल तक एक विधवा की तरह निभाना होगा । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
03/09/2015

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