Saturday, 4 July 2015

गुमनाम लखौड़ी
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अवध के नवाब ने बड़े चाव से अंग्रेजों के लिये रेजिडेसी बनाने के लिये पहला लखौड़ी का पत्थर रखा तो उसको शायद यह भान ही ना होगा कि यह इमारत आने वाली सदी में अपने खानदान के आखिरी वारिस के लिये कांटो का ताज बनवा रहा है ।

पूरा अवध प्रांत अंग्रेजों ने वापस हासिल कर लिया । बदले में उनको रेजीडेन्सी में क्रांतिकारियों द्वारा  खेले खूनी खेल की गवाह वह खण्डर इमारत भी मिली।

असफल क्रान्ति ने नवाब को अंग्रेजों ने कलकत्ता फिर इंग्लैंड निर्वासित कर दिया ।

आज वही कभी सुंदर  रही इमारत , आज गुमनामी की धूल में दबी उस लखौड़ी की चीखें ,  प्रातः बुजर्गो व बच्चों के  चहल कदमी का स्थल व दिन में चोंच से चोंच लड़ाते  प्रेमियों के एकांत क्षणों के बीच दब कर रह गई।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/04/2015

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