Thursday, 23 April 2015

बोझ- कर्जा
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हलहाते खेतों को देख के उसका मन कभी ख़ुशी से झूम उठा होगा, सपने देखता होगा , अपने छोटे बच्चों को स्कूल में भर्ती करवाने के , बीबी के कानों के लिए नए झुमके बनवाने के , जिसे उसने पिछले साल सूदखोर के हवाले कर दिये थे ।
पर यह क्या प्राकृतिक आपदा !
बिन मौसम ऐसी तूफानी बरसात ने उसके सारे अरमानो पर पानी फेर दिया। अब तो सरकारी राहत का चेक भी बाउंस हो चुका था ।
आज तो हद ही हो गई उसके सगे वालों ने भी उसका साथ छोड़ दिया । बच्चे दाने दाने के लिए मोहताज हो गए थे ।

हरिया की उम्र ही क्या थी जो उसने रैली के दौरान आत्म हत्या कर ली ? बस यही कि वह एक किसान था , जिसने खेती के लिए बैंक से मात्र पैंतीस हजार रुपये का कर्ज लिया था ।
पर यह कैसी इन लोंगो की असंवेदन शीलता ! "वह तो मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराने के लिए पेड़ पर चढ़ा था। "
"क्या इन मासूम किसानों का खून इतना सस्ता है ? कोई भी ऐरा गैरा , इनका प्रयोग अपने राजनैतिक फायदे के लिए करता फिरे ।"
(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्क्षित
लखनऊ  , उ  प्र । 
23/०4/2015


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