Thursday, 30 April 2015

दीवार मिलन- 2-
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आज अरुण के गले से कौर नहीं उतर रहा था । जब से उसने अपने बड़े भाई के गले में कैंसर के बारे में सुना तब से उससे वह बैचेन है । अनमने मन से उसने थाली को किनारे खिसका दिया ।


“ हाँ खाने का मन तो मेरा भी नहीं है ऐसी मनहूस खबर सुनने के बाद किसको भूख है । “ अजी , क्यों ना हम भाईसाहब को शहर ले आयें । अरे तूने तो मेरे मन की बात कह दी ।

प्रकृति का भी अजीब खेल है I कल तक जिन दो भाईयों के बीच जायदाद को लेकर रिश्तों में खराशें आ गई थीं I

बरबस ही एक दूसरे की ओर मदद को बढ़ते हाथ, आज एक दूसरे का सहारा बन रहे हैं I दोनों के बीच अहं , दंभ के मसालों से चुनी हुई दीवार आँखों से गिरते पश्चाताप के आंसुओ के सैलाब में , गोते लगाती हुई, कही दूर बही जा रही थी I

 " आखिर खून उबाल जो ले रहा है "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित I

लखनऊ I उ.प्र I

29 / 04 / 2015



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