Monday, 30 March 2015

देखा - देखी 
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शहर की चमक दमक दिखला कर बेवकूफ बना दिया उसने तुझे , मैं तो पहले ही कहती थी कि श्याम की बात में मत विश्वास कर , पर तुमने एक ना सुनी , गाँव की अच्छी भली खेती बाड़ी को छोड़ शहर चले आये। न रहने को छत है ना ठीक से खाना पीना , क्या काम दिलाया उसने कहता था शहर में बढ़िया नौकरी दिलवाएगा , यह पीठ पर सीमेंट की बोरी और सिर पर ईंटों का ढेर । बुधिया की आँखों से झरती आंसुओं की धारा मानो उसकी हँसी उड़ा रही हो कि "दूर के ढोल सुहावने होते हैं "

(पंकज जोशी ) सर्वधिकार सुरक्षित 
लखनऊ   प्र

30/03/2015

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