Thursday, 19 March 2015

लघुकथा :- आधुनिक लेखिका
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दृश्य 1) नई जगह तबादला हुए पन्द्रह दिन ही हुए होंगें , पति उच्च पद पर तैनात एक सरकारी अधिकारी हैं । बच्चों के स्कूल और पति देव के ऑफिस चले जाने के बाद वह घर पर अकेली रह जाती थी यूँ तो उसके घर पर नौकरों चाकरों का तांता लगा रहता है । पर समय कैसे कटे उसका , टी वी खोलती तो वही घिसे पिटे सास बहू के सीरियल या फिर बलात्कार से पटी ख़बरें , गुस्से से टीवी का रिमोट उठाया और स्विच ऑफ ।
उसके लिये किसी के पास समय नहीं था  । धीरे धीरे वह अवसाद से ग्रसित हुई जा रही थी ।

दृश्य 2) घर पर खाली बैठे बैठे यूँ ही उसे ख़याल आया चलो कुछ ना सही तो आज कुछ दिमाग की कसरत ही की जाय सुडूको या क्रॉसवर्ड खेल कर , हाथ में उसने गर्मागर्म ग्रीन टी का प्याला और हाथ में अखबार लिये रॉकिंग चेयर पर बैठ गई । कुछ ही देर के बाद, उसके हाथ सुडोकू को छोड़ अखबार के कागजों में शब्द उकेरने लगे अरे यह क्या यह तो कहानी बन गई ।अब उसको नया मकसद मिल गया था जीवन को नए सिरे से जीने का अब जब कभी वह खाली होती तो लिखने बैठ जाती । अब वह कलम की सिपाही हो गई है ।
दृश्य 3) कल तक अवसाद में रहने वाली इस औरत की कहानियां बड़े बड़े अखबारों में बदले हुए नामों के साथ प्रकाशित होने लगी । अब उसके पति देव उसी के द्वारा रचित कहानियों को उसे ही पढ़ कर सुनाया करते और लेखिका की तारीफों के पुल बांधते और वह मन ही मन मुस्काती ।
दृश्य 4) आज उसी के द्वारा लिखे उपनन्यास का आज विमोचन है , तय समयानुसार उसको पहुंचना है । हाल खचाखच भरा हुआ है । स्टेज में मंत्री जी के साथ उसके पतिदेव भी बैठे हैं । माइक पर से पुस्तक की लेखिका अनामिका को उनके उपनन्यास 'आधुनिक लेखिका' के विमोचन के लिये मंच पर आने के लिए आग्रह किया जाता है । जैसे ही वह मंच पर अपना आसन ग्रहण करने के लिये सीढ़ियां चढ़ती है पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजाय मान हो जाता है । उसके पति देव अपनी सीट छोड़ कर खड़े हो जाते है, नवोदित लेखिका के सम्मान में ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
18/03/2015



4 comments:

  1. पंकज भाई अच्छी कहानी ,हार्दिक शुभकामनाऍ

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  2. धन्यवाद आ . आनन्द जी

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  3. धन्यवाद आ . आनन्द जी

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