Sunday, 15 March 2015

लघुकथा :-  उद्धार
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शालू शालू यह क्या तुम यहाँ कैसे और यह क्या तुम्हारे पैरों में जंजीरे और तुम्हारे कपड़े तार तार क्यों है ? क्या इन बदमाशों ने क्या तुम्हारी इज्जत लूटी ? अनिल ने एक ही साँस में सारे प्रश्न पूछना चाहा। तुम यहाँ अनिल शालू ने उलटे उससे पूछा।

अरे यह तो हमारा रोज का काम है । डिपार्टमेंट को पहले से ही शक था कि एक गिरोह शहर में सक्रिय है जो लड़कियों को पहले नशे की लत लगाते हैं और जब वह उनके चंगुल में फंस जाती हैं तो उनको देश के बाहर बेच देते है । अनिल ने प्रत्युत्तर दिया।काश मैंनें अपने माँ बाप की बात मान लेती और आम घरेलू लड़कियों की तरह रहती अनिल। पर मैं तो चुपचाप अमित की चिकनी चुपड़ी बातों मे आकर उसके साथ रेव पार्टी में चली गई , वहां क्या हुआ यह मुझे याद नहीं पर उसके बाद जब होश आया तो मैंने खुद को यहाँ कैद पाया ,घर वालों को भी नहीं बताया । अनिल तुम तो मेरे बचपन के दोस्त हो , तुम पुलिस में हो कुछ तो करो प्लीज अनिल शालू बोलती रही और आँखों से बहती अश्रु की धार उसके पछतावे की ओर ईशारा कर रही थी।

ठीक है तुम यहाँ चुपचाप जैसी पड़ी हो वैसे ही पड़ी रहो। कह कर अनिल वहाँ से चला गया।
कुछ देर बाद पुलिस की रेड उस तहखाने में पड़ी जहाँ शालू जैसी कई अन्य लड़कियाँ कैद थी। अमित जो शालू को फुसला कर ले गया था। उसको भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
इस घटना के बाद घर वालों ने शालू को अपनाना तो दूर उसे पहचानने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने उसको महिला सुधार गृह भेजने का आदेश दे दिया।
सुधार गृह से छूटने के बाद शालू के पास ना कोई छत थी नाहीं सर पर हाथ रखने वाला कोई अपना बड़ा उस समय अनिल ने उसका हाथ मांगते हुए कहा "शालू मैं भी अनाथ हूँ और तुम्हारे अपने होते हुए भी आज तुम्हारा कोई नहीं है , क्यों ना हम एक दूसरे का सहारा बन जायें "

शालू ने नजरे जमीन पर गड़ाते हुए कहा कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी अनिल तुम मुझे अपनाने को तैय्यार हो। "पगली मैं तो बचपन से ही तुमसे प्यार करता था पर तुम्हारे और मेरे बीच दौलत की दीवार जो थी सो मन की बात मन मे ही रह गई थी। "

अनिल की बातें सुन कर शालू ने उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया और फफक कर रो पड़ी यह आँसू उसके अनिल के प्रति कृतज्ञता के थे जिसने उसको नवजीवन दे कर उसका उद्धार किया ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

15/03/2015



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